भारत भूषण को फिल्मों के सर्वाधिक सरल, सहज, शिष्ट और शालीन अभिनेताओं में अग्रतम माना जाएगा। किसी समकालीन अभिनेत्री के साथ उनका कोई स्कैंडल कभी सामने नहीं आया।
अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी भारत भूषण ने पूरी तरह सात्विक प्रवृत्तियों को अपनाया। न कभी उन्होंने मांस खाया, न मदिरा चखी। यहां तक कि सिगरेट के धुएं का स्वाद क्या होता है, इसे भी वह कभी नहीं जान पाए।
भारत भूषण की पहली फिल्म थी भगवतीचरण वर्मा द्वारा लिखित और केदार शर्मा-निर्देशित `चित्रलेखा’। केदार की ही दूसरी फिल्म `सुहागरात’ से उन्हें राष्ट्रव्यापी ख्याति मिली, `बैजू बावरा’ ने उस ख्याति में चार चांद लगाए और फिर सोहराब मोदी-कृत `मिर्जा ग़ालिब’ ने उनको जन-जन का सितारा बना दिया।
`आनंद मठ’ सरीखी फिल्मों में अपने अभिनय से राष्ट्रधारा के विस्तार और प्रसार को समुचित गति प्रदान करने में वह सफल और समर्थ रहे। भारत भूषण हिंदी फिल्म-संसार के अकेले हस्ताक्षर थे, जिन्हें पढ़ने-लिखने में सचमुच रुचि थी।
उनके घरेलू पुस्तकालय में कई हजार पुस्तकों का संग्रह था और प्रत्येक पुस्तक के विभिन्न पन्नों पर उनकी हस्तलिखित टिप्पणियां। हर पुस्तक के कवर पर उनके हस्ताक्षरों से लिखा मिलता था, `यह पुस्तक फलां-फलां विक्रेता से खरीदी गई है और आप इसे पढ़ना चाहते हैं तो वहां से आप इसे खरीद सकते हैं।
अपने जीवनकाल में भारत भूषण ने पचास से अधिक फिल्मों में काम किया और आजकल के हिसाब से करोड़ों कमाए, लेकिन उनका निधन मोहताजी के आलम में ही हुआ। जिस प्रियजन को उन्होंने अपने कार्य-व्यापार की व्यवस्था सौंपी थी, वह उनका नहीं बल्कि उनकी धन-सम्पत्ति का प्रेमी निकला।
उनके द्वारा कमाए गए धन से उसने ऐसी दसियों फिल्मों का निर्माण कर डाला। कहा जाता है कि `मिर्जा गालिब’ जैसी फिल्म के निर्माता ने भी उनके हाथों हजार-दो हजार की राशि पकड़ा कर अपना पल्ला झाड़ लिया था।