संजीव कुमार स्टंट फिल्मों के दायरे से निकलकर घुसपैठ करके सामाजिक फिल्मों में आ गए थे। ‘पति-पत्नी में वह नंदा के साथ हीरो का रोल निभा रहे थे। एक दिन वह मैट्रो सिनेमा में कोई फिल्म देखने गए हुए थे।
अपनी आदत (या कंजूसी) के अनुसार उन्होनें लोअर स्टाल का टिकट खरीदा था। इत्तफाक से नंदा भी उस दिन मैट्रो में फिल्म देखने आई थीं। नंदा बालकनी में बैठी हुई थीं।
संजीव ने उन्हें देखा तो दूर से सलाम झाड़ दिया। अगले दिन जब नंदा सेट पर पहुंचीं तो निर्माता से संजीव की शिकायत करते हुए उसे फिल्म से अलग करके कोई ढंग का हीरो लेने के लिए कहा।
बोली ‘यह हीरो है या कोई फेरी वाला है। जरा हूलिया तो देखिए, एक तो बेढंगे कपड़े पहनता है, ऊपर से निचली क्लास में जाकर फिल्म देखता है... इसके साथ काम करके तो मेरा भी ग्रेड गिर जाएगा।
नंदा की शिकायत खत्म होने के थोड़ी देर बाद संजीव भी सेट पर पहुंच गए। उन्होंने उस वक्त भी वही कुर्ता और पायजामा पहन रखा था। हाथ में छत्री लटक रही थी और घड़ी के बेल्ट के नीचे बस का टिकट तह किया हुआ रखा था। उन्हें इस हालत में देखकर सेट पर मौजूद लोगों ने जोरदार ठहाका लगाया।
एक ने संजीव से कहा, तुम हीरो हो तो हीरो की तरह रहना भी सीखो। गाड़ी नहीं रख सकते तो कम से कम टैक्सी में आया-जाया करो। अगर यह ‘फेरी वाले’ का लिबास ही पहनना है तो कालबा देवी में जाके कोई और धंधा करो फिल्म लाइन छोड़ दो।
संजीव कुमार को उस समय यह बातें बड़ी कड़वी लगी थीं क्योंकि उस समय वह इस स्थिति में नहीं थे कि जवाब दे सकें। सच में वक्त बड़ी जालिम चीज होता है।
उस समय जिसने भी उन्हें ‘फेरी’ वाला कहा होगा, उन्हें बाद में जरूर अपनी इस बात पर अफसोस होता होगा। कहते हैं कि संजीव कुमार की गाड़ी जब फिल्मों में चल निकली तो नंदा ने जब-जब उनके साथ काम किया, वह अपने कहे पर शर्मिंदा होती थीं। लेकिन संजीव कुमार ने कभी उनका बुरा नहीं मनाया।