साचा बैरॉन कोहेन की नई कॉमेडी फिल्म 'द डिक्टेटर' एक ऐसे काल्पनिक तानाशाह पर आधारित है जिसका तानाबाना, दुनिया के तमाम तानाशाहों की जीवन शैली और गतिविधियों के इर्दगिर्द बुना गया है। ये काल्पनिक पात्र उल्टी-पुल्टी हरकतें करता है, ऐशो आराम के लिए जिंदगियां तबाह करता है।
लेकिन जैसा कि कोहेन ने खुद कहा इस फिल्म की कल्पना का वो पात्र उत्तरी अफ्रिका स्थित लीबिया के पूर्व तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी से प्रेरित था। जो अपने हरम (किसी एक पुरुष की अनेक स्त्रियों के रहने का स्थान, जहां अन्य मर्दों का जाना वर्जित होता है) में महिलाओं खासकर कम उम्र की लड़कियों को खून के आंसू रुलाता था।
उन्हें अश्लील फिल्में दिखाता, उनके शरीर से खेलता, भूख-प्यास से तड़पाता, रूह कंपा देने की हद तक प्रताड़ित करता था।
इन जानकारियों का खुलासा फ्रांसीसी महिला पत्रकार एनिक कोजिन ने उन महिलाओं के साक्षात्कार के बाद किया, जो गद्दाफी के हरम में कैद थीं। गद्दाफी के वहशीपन को बयां करने के लिए एनिक को किताब लिखनी पड़ी। उसने 'गद्दाफी के हरम की शिकार' नाम की किताब लिखी।
किताब में गद्दाफी के महल के 'स्त्रीगृह' में सालों तक कैद में रहने वाली महिलाओं की आपबीती दर्ज की गई, जिन पर गद्दाफी की बुरी नजर पड़ने के बाद उनकी जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो गई।
पेश करने से पहले लड़की को किया जाता तैयार
किताब में सबसे दर्दनाक उदाहरण एक 15 साल की लड़की 'सोराया' का है, जो आजाद लीबिया में अपनी जिंदगी की शुरुआत करना चाहती है, पर कर नहीं सकी।
दअरसल गद्दाफी को स्कूलों में जाने का बड़ा शौक था। बहाना कोई भी हो। वो स्कूल पहुंच जाता। उसके किसी लड़की के सिर पर हाथ रखने का मतलब था कि वह लड़की उसे पसंद है। एक स्कूली कार्यक्रम में सोराया ने गद्दाफी को फूलों का गुलदस्ता भेंट किया, वहीं गद्दाफी की काली नजर उस पर पड़ गई। उसने सोराया सिर पर हाथ रखकर थपथपाया और उसकी जिंदगी नर्क से भी बदतर हो गई।
इसके बाद उसके खून की जांच की गई, वक्ष के नाप लिए गए और सजाया गया। फिर काफी कम कपड़ों में गद्दाफी के सामने पेश किया गया। सोराया ने इसका पुरजोर विरोध किया, लेकिन अंत में उस वहशी के सामने उसे हार माननी पड़ी।
खून की जांच कर ये पता लगाया जाता था कि उन्हें कोई बीमारी तो नहीं है।
सोराया का साक्षात्कार करने वाली फ्रांसीसी पत्रकार के अनुसार "गद्दाफी अपने महल के तहखानों में औरतों को बंदी बनाकर रखता। उन्हें किसी भी वक्त सिर्फ अपने अंत:वस्त्रों में गद्दाफी के सामने आना होता और उसके वहशीपन का शिकार होना होता।"
सोराया के घरवाले भी करने लगे उससे घृणा
सालों गद्दाफी की कैद में रहने के कारण सोराया के घरवाले अब उससे घृणा करने लगे। सोराया को डर है कि उसके भाई उसे देखते ही मार डालेंगे। इसलिए वो आज भी छुपकर रहती है। उसके घरवालों को लगता है कि अगर समाज को सोराया के इतिहास के बारे में पता चलेगा, तो उनका नाम खराब होगा।
जरा सोचिए कि आज सोराया पर क्या बीत रही होगी। और सोराया तो मात्र एक कहानी है। लीबिया के एक दैनिक अखबार में छपी खबर के मुताबिक गद्दाफी की हवस की शिकार औरतों-लड़कियों की संख्या हजारों में है।
गद्दाफी पर किताब लिखने वाली पत्रकार कहती हैं "इन लड़कियों ने कभी ये जिंदगी नहीं चुनी थी, पर इस बात को कोई नहीं समझता। हर कोई उनके जीवन का फैसला उनके साथ हुए हादसों से जोड़कर करता है।"
विरोधियों की पत्नी-बेटियों से तो और हैवानियत
गद्दाफी की दासियां तो उसकी क्रूरता से मानसिक संतुलन खो बैठती थीं, अब आप ही अंदाजा लगाइए कि वह अपने विरोधियों की पत्नी और बेटियों के साथ क्या करता होगा।
वह विरोधियों पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए उनके सामने उनकी पत्नी और बेटियों से जानवरों सा सलूक करता। यहां तक कि अपने मंत्रियों और विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए भी उनकी पत्नी-बेटियों की अस्मत लूटता। कहा जाता है कि उसे बलात्कार करने की एक तरह से लत लग गई थी।
दिलचस्प बात यह है कि उसकी हवस सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं थी। कई पुरुषों को भी इसकी पीड़ा झेलनी पड़ी।
फ्रांसीसी पत्रकार के अनुसार "गद्दाफी के पीड़ितों में उसके कुछ पुरुष मंत्री, राजनयिक, सेनाधिकारी और कबायली नेता भी हुआ करते थे, जिन्हें उसके साथ हमबिस्तर होना पड़ता था।"
जब विदेश में होता तो क्या करता
गद्दाफी जब भी लीबिया से बाहर जाता, तो उसके साथ उसके हरम की एक महिला 'माबरुका शेरिफ' भी साथ में जाती। अगर आप सोच रहे हों कि गद्दाफी विदेश में उसी महिला के साथ सहवास करता होगा, तो ऐसा नहीं है।
दरअसल वह महिला दूसरे देशों में गद्दाफी के लिए कम उम्र की खूबसूरत लड़कियों का इंतजाम करती थी। लड़कियां न मिलने की स्थिति में कभी-कभी लड़कों का इंतजाम किया जाता था। यह जानकारी गद्दाफी की करतूतों पर गहराई से शोध कर रही फ्रांसीसी पत्रकार को पेरिस एक फ्रांसिसी राजनयिक ने दी थी।
उसके मुताबिक "जब माबरुका शेरिफ पेरिस आती तो वहां के काफी महंगे होटल चैंप्स एलिसीज में रुकती। उसकी हरकतों के चलते फ्रांसीसी अधिकारियों को इस बात का थोड़ा-बहुत अंदाजा लग गया था, लेकिन कभी किसी को उंगली उठाने की हिम्मत नहीं पड़ी।"
निहायत डरपोक था कर्नल गद्दाफी
खून बहाने से कभी भी ना हिचकने वाले गद्दाफी को ऊंचाइयों से डर लगता था। पानी के ऊपर से उड़ान भरने से वो बचता था और कभी होटल में रहना पड़ा तो ग्राउंड फ्लोर पर ही रहना पसंद करता। इसीलिए जब 20 अक्टूबर 2011 की रात नेशनल ट्रांजीशन काउंसिल के विद्रोहियों ने उसे घेर लिया तो वह गिड़गिड़ाने लगा। उसके अंतिम शब्द थे- "प्लीज डॉन्ट शूट मी।"
गद्दाफी का उदय 1967 में अरब-इसराइल युद्ध में अरब जगत की हार से उपजी अरब राष्ट्रवाद की लहर से हुआ। इस हार से कई अरब देशों में भारी असंतोष फैल गया। लीबिया में वहां के शासक इदरिस को इस हार के लिए दोषी ठहराया गया।
पहले से ही राजशाही से असंतुष्ट लीबियाई जनता के मिजाज को समझते हुए लीबियाई सेना के 27 वर्षीय कैप्टन गद्दाफी ने राजशाही को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई और इदरिस के इलाज के लिए विदेश जाते ही मौके का फायदा उठाकर रक्तहीन क्रांति के जरिए एक सितंबर 1969 को तख्ता पलट दिया।
उसकी मौत भी सिहरन दे गई...
गद्दाफी ने लीबिया की आर्थिक दशा पर ध्यान देते हुए तेल शोधक कंपनियों को चेतावनी दी कि नया करार करें या देश से बाहर निकल जाएं। इससे लीबिया की आर्थिक दशा में भारी उछाल आया। इससे पहले लीबिया की अर्थव्यवस्था विदेशी तेल शोधक कंपनियों के रहमो-करम पर थी। गद्दाफी के इस फार्मूले का इतना असर हुआ कि अधिकांश अरब देशों ने इसका अनुसरण किया। अरब देशों में हुए 'पेट्रो-बूम' का श्रेय भी बहुत हद तक गद्दाफी को ही दिया जाता है।
गद्दाफी ने अपनी एक अलग ही राजनीतिक विचारधारा बनाई थी। उसने एक किताब भी लिखी 'ग्रीन बुक', इस किताब में 'लोगों की सरकार’ के बारे में बखान किया गया। उसने लीबिया को एक जम्हूरिया घोषित किया, जिसका अर्थ था ‘लोगों का राज’। इसके पीछे तर्क दिया गया कि लीबिया अब सही मायनों में लोकतंत्र बन गया है, जिसे लोकप्रिय स्थानीय क्रांतिकारी परिषदें चला रही हैं।
लेकिन जैसा कि हर तानाशाह के साथ होता है वही गद्दाफी के साथ भी हुआ. 42 वर्षों के तानाशाही शासन के बाद लीबिया में विद्रोह हो गया और उसे अपने परिवार सहित भागना पड़ा। विद्रोहियों ने कई दिनों बाद उसे एक पुलिया के नीचे सीमेंट के पाइप में से निकाला। खबरें बताती हैं कि विद्रोहियों ने पिटाई कर उसकी ऐसी गत बनाई कि अक्टूबर, 2011 को उसकी मौत हो गई।