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आखिर कहां गायब हो रही हैं लड़कियां? पढ़िए खास रिपोर्ट

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इस साल मार्च तक के आंकड़े बताते हैं कि राजधानी में बच्चों के अपहरण के कुल दस मामले दर्ज किये गए हैं जिसमें 6 लड़कियों के नाम भी शामिल हैं। सवाल ये है कि आखिर पुलिस क्या कर रही है? और अपराध बढ़ने से रोक क्यों नहीं पा रही है।
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महिला सुरक्षा के नाम पर सरकारी सरोकार क्या केवल टीवी और अखबारों की खबरों तक ही सीमित हैं। सवाल यह है कि आखिर, सरकार जहां लड़कियों के सुरक्षा की बात करती है वहीं ऐसे आंकड़े हमें ये सोचने पर मजबूर कर देतें हैं कि क्या वाकई सरकारों के सरोकार महिला सुरक्षा से जुड़े हैं?

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आखिर कहां जा रही हैं लड़कियां?

अब अपराध का निशाना केवल वो लोग नहीं बनते जिनकी किसी से रंजिश होती है, बल्कि वो भी बनने लगे हैं जो दुनिया को ढंग से देखना भी शुरू नहीं कर पाते। बचपन अब केवल बाल श्रम का शिकार नहीं होता, बल्कि अपहरण का भी शिकार होता है। पूरी दुनिया बच्चों के बाल श्रम पर तो सवाल उठाती है लेकिन बच्चों के अपहरण पर शायद ही कोई सवाल उठाता हो।

हम आये दिन स्त्रियों पर यौन शोषण और बलात्कार की खबरों से रुबरु होते हैं लेकिन अब बात केवल वहीं तक सीमित नहीं है। बच्चियों के अपहरण और गायब होने की खबरें अब ज्यादा आ रहीं है। NCRB के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2014 में 0-18 साल तक की लड़कियों के गायब होने के कुल 215 मामले दर्ज किये गये वहीं इनके अपहरण के कुल 1167 मामले दर्ज किये गये।
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सरकार के दावों से उलट है हकीकत

सरकार भले ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर तमाम दावे करे लेकिन सच्चाई उससे बिल्कुल अलग है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं-बच्चियों के खिलाफ अपराधों में कोई कमी नहीं आ रही है। जहां 2010 में 5484 बच्चियां बलात्कार का शिकार हुई थी, वहीं 2011 में आंकड़ा 7112 तक पहुंच गया। 2013 के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि पूरे देश में अपहरण के कुल 51881 केस दर्ज हुये थे।

इन मामलों में पुलिस भी फिसड्डी साबित हो रही है। बीते साल पुलिस कुल 17 लड़कियों को बरामद करने में सफल हो पाई, जो गायब होने के अनुपात में कहीं ज्यादा कम हैं। पुलिस के पास अधिकतर सुविधायें होने के बावजूद भी बरामदगी की संख्या ये बयां करती है कि या तो पुलिस इन मामलों में अपनी रुचि नहीं दिखाती, अथवा उसका सूचना तंत्र पूरी तरह से विफल है।
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