फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अवैध भवनों को वैध करने वाले टीसीपी एक्ट पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Sat, 23 Dec 2017 03:05 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
विज्ञापन
विज्ञापन
हिमाचल में अवैध भवनों को नियमित करने वाले टीसीपी कानून को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा आदेश पारित किया है। इससे अवैध भवनों को नियमित होने की आस लगाए बैठे मकान मालिकों की उम्‍मीदों पर पानी फिर गया है।
विज्ञापन


प्रदेश हाईकोर्ट ने अवैध भवनों को नियमित करने के लिए वीरभद्र सरकार की ओर से बनाए गए कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने एक्ट में संशोधन को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग अधिनियम के

मूल उद्देश्य के विपरीत करार देते हुए निरस्त करने के आदेश पारित किए। प्रार्थी अधिवक्ता अभिमन्यु राठौर, राघव गोयल व हितांशु जिष्टु ने इस संशोधन को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
विज्ञापन


सरकार ने कानून के पक्ष में दलील देते हुए कहा था कि लोगों की आर्थिक हालत में मजबूती के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों ने शहरी क्षेत्रों की ओर रुख किया। इससे शहरों के आसपास रिहायशी इमारतों की जरूरतें बढ़ गईं। इन्हीं हालात में लोगों ने नियमों की अवहेलना कर अवैध निर्माण कर लिए।
Trending Videos

अवैध निर्माण गिराने से पैदा हो सकती है ये स्थिति

अवैध निर्माण ज्यादा तादाद में हैं जिन्हें हटाने या गिराने से कानून व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की गई तो कइयों को बिना रिहाइश के रहने पर मजबूर होना पड़ेगा। इससे सामाजिक व आर्थिक ढांचा भी बिगड़ सकता है।

सरकार का कहना था कि इन सभी मुश्किलों को देखते हुए सरकार ने कानून में संशोधन कर ऐसे मालिकों को राहत देने की कोशिश की। इस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इन दलीलों को साबित करने के लिए कोई तथ्य पेश नहीं किए।

कोर्ट ने कहा कि इन अवैध निर्माणों को हटाने के लिए न तो कोई कानूनी अड़चन है और न ही कानून व्यवस्था का कोई सवाल। अवैध भवनों को तोड़ने के लिए कोई बड़ा खर्च नहीं होना है। जो भी खर्च होना है उसे अवैध निर्माण करने वालों से वसूला जा सकता है।
 

सरकार की दलालों पर कोर्ट ने ये कहा

संशोधन को गैरकानूनी ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार का दायित्व कानून के प्रावधानों की अनुपालना सुनिश्चित करना है। इस दायित्व में असफल होना वास्तव में सरकार की विफलता को दर्शाता है।

कोर्ट ने सरकार की आलोचना के साथ टिप्पणी कर कहा, ऐसे संशोधन कानूनों की अनुपालना के बजाय गैरकानूनी कार्यों को कानूनी जामा पहनाने के लिए लाए जाते हैं। 


हलफनामे में पुरानी नीतियों का हवाला
संशोधन के पक्ष में सरकार ने हलफनामे में तर्क दिया था कि इस संशोधन से पहले वर्ष 1997 से 2009 तक 7 से अधिक बार अवैध भवनों को नियमित करवाने के लिए नीतियां बनाईं गईं थीं।

8 अप्रैल 1997, 21 फरवरी 1999, 20 नवंबर 2006 व 25 फरवरी 2009 को प्रदेश के सभी प्लानिंग क्षेत्रों के लिए जबकि 12 सितंबर 2000 को नगर निगम क्षेत्र में नए मर्ज किए क्षेत्रों, 4 सितंबर 2002 को नगर पंचायत ढली, न्यू शिमला, कसुम्पटी व टुटु क्षेत्रों, 13 फरवरी 2004 को कुफरी व शोघी तथा 29 जून 2006 को घनाहट्टी के लिए रिटेंशन पालिसियां लाईं र्गइं थीं।

बेईमानों के पक्ष में खड़ी दिखती है सरकारेंः कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1994 से अदालतें बार-बार सरकारों के ऐसे प्रयासों को खारिज करती आईं हैं। भ्रष्टकर्मियाें के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए जाते रहे हैं। सरकारें इस तरह के प्रावधान बना कई बेईमानों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

इससे बेईमानों व कानून तोड़ने वालों को बढ़ावा मिलता है और वास्तव में उनके खिलाफ  कोई कार्रवाई नहीं होती। खंडपीठ ने अपने फैसले में वर्ष 2009 में न्यायाधीश राजीव शर्मा की एकल पीठ द्वारा दिए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अवैध भवनों को नियमित करने के लिए टीसीपी एक्ट में किसी भी

तरह के संशोधन करने से मना किया गया था। फिर भी कानून के विपरीत राज्य सरकार ने इस तरह का संशोधन कर हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना की। कोर्ट ने टिप्पणी कर कहा, ऐसे संशोधन गैर कानूनी काम को कानूनी जामा पहनाने के लिए लाए जाते हैं। 
विज्ञापन

यहां जानिए पूरा मामला

मामले के अनुसार इसी वर्ष 24 जनवरी को सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर हिमाचल प्रदेश टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (संशोधन) अधिनियम 2016 राजपत्र में प्रकाशित किया। कानून को 15 जून 2016 से लागू किया गया।

कानून को 24 जनवरी 2018 तक प्रभावी भी बनाया गया। इस कानून के तहत नियमितीकरण के लिए संबंधित लोगों को 60 दिनों का समय देते हुए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। यह समय अधिसूचना के राजपत्र में प्रकाशित होने से शुरू हुआ।

आवेदन के साथ 1000 की फीस मांगी गई। कानून के तहत आए आवेदनों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाना था। इसमें जैसा है जहां है वाली नीति को अपनाते हुए नियमितीकरण करने की योजना शामिल की गई।

इस पॉलिसी का लाभ लेने वालों को किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट आवेदन के साथ लगाना जरूरी किया गया था। ग्रीन व हेरिटेज क्षेत्रों में इस कानून को लागू नहीं किया गया था।

जो भवन इस संशोधित कानून के बावजूद भी नियमितीकरण के लिये पात्र नहीं होने थे उनके बिजली पानी के कनेक्शन काटने और उन्हें गिराने का प्रावधान भी इसमें बनाया गया था।

नियमितीकरण फीस भी 400 से 1000 रूपये प्रति वर्ग मीटर निर्धारित की गयी थी। इस प्रावधान के तहत नियमितीकरण के लिए आनलाइन 8,782 आवेदन आये थे।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें