देश में नई दवा की खोज को गंभीरता से नहीं लिया जाता। अगर देखा जाए तो यह सालों तक चलने वाली लंबी प्रक्रिया है। नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि प्रभावी दवा का रिसर्च एंड डवलपमेंट (आर एंड डी) कोई जादू नहीं।
केवल 0.02 प्रतिशत प्रयोगों के ही सफल होने की संभावना ड्रग डिस्कवरी में होती है। गुरुवार को एमिटी यूनीवर्सिटी में ड्रग डिस्कवरी पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया।
लाइफ सेविंग ड्रग्स की खोज के लिए जरूरी तकनीक पर जानकारी देने के लिए यह सेमिनार एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी ने आयोजित किया था।
मुख्य वक्ता और ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूिक्लयर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज, दिल्ली के सेंटर फार सीबीआरएन मिटिगेशन के अपर निदेशक डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि एक दवा में औसतन शोध और विकास के लिए 15 से 20 साल का समय लगता है।
कोई जादू नहीं है, जिससे नई दवा की खोज कर ली जाए। प्रक्रिया के बाद निष्कर्ष यह है कि प्री-क्लीनिकल टेस्ट में ही 1000 कंपाउंड में से 999 फेल हो जाते हैं।
केवल 0.1 प्रतिशत ड्रग कंपाउंड ही मरीजों पर ड्रग ट्रायल के लिए योग्य पाए जाते हैं। अगर इस सफलता की दर को देखें तो 15 साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिक को 0.02 प्रतिशत संभावना ही होती है।
डॉ. शर्मा के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया का असर उन मरीजों पर पड़ता है, जिन्हें तुरंत ही उस दवा की जरूरत होती है। आधुनिक तकनीक से लंबी और खर्चीली प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने की जरूरत है।
नैनोटैक्नोलॉजी इसके लिए एक प्रभावी औजार के तौर पर सामने आई है। यह सफलता ही है कि आज सीधे बीमार कोशिकाओं का इलाज करने की दिशा में आगे बढ़ पाए हैं।
सेमिनार में डॉ. रेड्डीज लैब में निदेशक डॉ. प्रदीप के सेस्मल, सीडीआरआई के फार्माकोलॉजी विभाग में पूर्व वैज्ञानिक डॉ. राम रघुवीर, रैनबेक्सी के डॉ. तौसीफ मोनिफ, एमिटी यूनीवर्सिटी के डीन रिसर्च विज्ञान एवं तकनीकी डॉ. कमर रहमान और पीवीसी रिटायर्ड मेजर जनरल केके ओहरी और निदेशक एमिटी बिजनेस स्कूल प्रोफेसर वीपी साही मौजूद रहे।
नैनोटेक्नोलॉजी पर ज्यादा भरोसा ठीक नहीं
तकनीकी सेशन में बीबीएयू में बायोसाइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. शुभीनी ए सरफ ने बताया कि नैनोटेक्नोलॉजी ने ड्रग डिस्कवरी की दिशा में बदलाव जरूर किए हैं।
दवाओं के रिसर्च और डवलपमेंट में भी तेजी आई। हालांकि, इसके साथ ही नैनो मैटेरियल्स के रूप में टॉक्सिसिटी का सामना भी करना पड़ रहा है।
ऐसे में जरूरी है कि इस तकनीक पर निर्भरता के साथ दवाओं के विकास में सावधानी बरती जाए। डीन साइंस एंड टेक्नोलॉजी, एमिटी डॉ. कमर रहमान का कहना था कि नैनोविज्ञान के जरिए मानव जीनोम तक सीधे पहुंचने वाली दवाओं का विकास संभव कर पाया है।
भविष्य में इस तकनीक से विकसित दवाएं ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित इलाज मुहैया कराने में सक्षम होंगी।