सब्सिडी एक एक ऐसा विषय है जिस पर खुलेआल बोलने से राजनेता और पॉलिसी मेकर परहेज करता है। मगर इस विषय पर खुलकर बहस होना और सब्सिडी किसे मिले इसके मानक तय होने चाहिये।
यह बात इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के सेंटर फार एग्रीकल्चर विभागाध्यक्ष प्रो. विजय पाल ने कही।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के बिजनेस स्कूल में आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रूप में शरीक हुए पाल ने कहा कि सब्सिडी के लिये पात्र लोगों का चयन इस तरह से होना चाहिये कि वे उसका लाभ उठा सके।
मैनेजमेंट के छात्रों को संबोधित करते हुये प्रो. पॉल ने कहा कि हमें विकसित और अल्प विकसित राज्यों को लेकर राज्य और केंद्र की खामियां निकालने के बजाय विकसित राज्यों से कुछ सीख लेकर अन्य राज्यों को भी विकास की राह पर ले जाने का प्रयास करने होंगे।
उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के घटकों की मौजूदा स्थिति और देश की आर्थिक व्यवस्था की स्थिति को आंकड़ों के साथ पेश कर बताया कि हमें कुछ इस तरह की पॉलिसी बनानी होगी कि हम पूरे देश को विकास की राह पर ले जा सके।
ग्रामीण क्षेत्र के विकास की जरूरत
हमें निजी क्षेत्र की शहरी क्षेत्र तक केंद्रित मानसिकता को बदलने के लिये उसे ग्रामीण क्षेत्र विकास की ओर ले जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां कृषि क्षेत्र की विकास दर महज 2.5 फीसदी हो, वहां विकास के सपने देखना और बात करना बैमानी होगा।
देश में मांग और पूर्ति में अंतर देश की कमजोर अर्थव्यवस्था का मुख्य कारण है। इसके लिये कृषि क्षेत्र में तकनीकि विकास और आधारभूत ढांचे का विकास न होने वजह है।
एसपीयू बिजनेस स्कूल के विभागाध्यक्ष प्रो. सीएल चंदन ने कहा कि आज कृषि के विकास पर सिर्फ सब्सिडी देकर विकास दर बढ़ाने की बात की गई।