लखनऊ विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स की मॉडल क्लासरूम में पढ़ने की हसरत दिल
में ही दबी रह गई है।
राज्य सरकार की योजना के तहत करीब सभी विभागों में
एक-एक मॉडल क्लासरूम बन जाना चाहिए था लेकिन दो साल बाद भी विश्वविद्यालय
के ज्यादातर विभागों में मॉडल क्लासरूम नहीं बन पाए हैं।
इक्का-दुक्का
विभागों में मॉडल क्लासरूम बनाए गए हैं लेकिन पढ़ने-पढ़ाने में उनकी भूमिका
अब तक न के बराबर ही है।
टीचिंग में
सूचना-तकनीक का लाभ देने के लिए लविवि के 40 विभागों में मॉडल क्लासरूम
बनाने की योजना बनाई गई थी। इसके लिए राज्य सरकार ने फरवरी 2011 में दो लाख
रुपये प्रति मॉडल क्लासरूम के हिसाब से बजट भी दिया था।
एजेंसी के माध्यम
से मॉडल क्लासरूम के लिए उपकरण भी खरीदे गए लेकिन समाजशास्त्र, कॉमर्स और
मनोविज्ञान विभाग जैसे एक-दो विभागों के अलावा किसी विभाग में मॉडल
क्लासरूम नहीं बन पाए।
मॉडल क्लासरूम के लिए प्रोजेक्टर, लैपटॉप, रोटेट
होने वाली स्क्रीन, माइकसेट और साउंड सिस्टम सप्लाई किए गए थे। शिक्षकों को
भी कॉपी-किताब और चॉक-डस्टर से मुक्ति मिल जानी थी।
जानकारों का कहना है
कि विज्ञान की पढ़ाई के लिए यह तकनीक ज्यादा उपयोगी हो सकती है।
विज्ञान की
पढ़ाई के समय विभिन्न चित्र और तालिकाओं को ज्यादा अच्छी तरह से दिखाया जा
सकता है लेकिन लविवि के विज्ञान संकाय के विभागों को भी मॉडल क्लासरूम का
लाभ नहीं मिल पा रहा है।
लविवि में इस समय
कॉमर्स, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र विभाग में मॉडल क्लासरूम चल रहे हैं।
मनोविज्ञान विभाग में तो अभी कुछ दिन पहले ही प्रोजेक्टर और स्क्रीन लगाई
गई है।
मॉडल क्लासरूम के लिए समन्वयक बनाए गए प्रो. पद्मकांत के अनुसार
लगभग सभी विभागों को उपकरण उपलब्ध करा दिए गए हैं। कोशिश की जा रही है कि
जल्द ही सभी विभागों में मॉडल क्लासरूम बन जाए।