उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय की सबसे महत्वपूर्ण कमेटी कार्यपरिषद की वैधता पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। कार्यकाल पूरा होने के बावजूद इसमें कुछ सदस्य हिस्सा ले रहे हैं।
शासन स्तर पर अभी तक इसे लेकर कोई कार्रवाई नहीं की गई, जबकि समिति का गठन करने के लिए कुलपति ने एक दिसंबर को शासन को पत्र भेजा है।
आरोप है कि विश्वविद्यालय के एक अधिकारी ने अपने चहेतों को कार्यपरिषद में बनाए रखने के लिए अभी तक शासन को समय रहते पत्र नहीं भेजा।
कार्यपरिषद में एचबीटीआइ कानपुर के निदेशक और केएनआइटी सुल्तानपुर के निदेशक बतौर सदस्य शामिल हैं, जबकि इनका कार्यकाल 2012 में पूरा हो चुका है।
यूपीटीयू के सूत्रों के मुताबिक, बीती आठ मई 2013 को हुई कार्यपरिषद में भी ये दोनों शामिल हुए। इस पर 11 मई, 2013 को कुलपति डॉ.आरके खांडल ने कुलसचिव से स्पष्टीकरण तलब किया था।
कुलपति ने पूछा कि बिना अनुमोदन के दोनों सदस्यों को कैसे शामिल किया गया। इस पर बताया गया कि शासन को पहले ही पत्र लिखकर इस बारे में सूचित किया गया था लेकिन समय रहते कार्रवाई नहीं हुई।
अनुसचिव प्राविधिक शिक्षा आरवी सिंह को दिए पत्र में लिखा है कि 29 जुलाई, 2010 को दोनों संस्थानों के निदेशकों को कार्यपरिषद में शामिल किया गया था और 2012 को इनका दो वर्ष का कार्यकाल पूर्ण हो चुका था।
विवि प्रशासन कर्मचारियों की उपस्थिति कम होने के कारण प्रस्ताव नहीं भेज पाया। वहीं, कुलपति ने कार्यपरिषद के नए सदस्यों के गठन से संबंधित पत्र राज्यपाल को भेज दिया।
राजभवन से यह पत्र शासन को भेजा गया है। अब एक दिसंबर, 2013 को कुलपति ने शासन को एक बार फिर पत्र भेजकर जल्द से जल्द कार्यपरिषद के गठन को कहा है।
ऐसी स्थिति में यूपीटीयू की वर्तमान कार्यपरिषद और उनके निर्णय कठघरे में आ गए हैं। एआईसीटीई के एक पूर्व सदस्य तो बीते आठ वर्षों से कार्यपरिषद में हैं।
यूपीटीयू के कुलपति डॉ. आरके खांडल कहते हैं कि उन्होंने कार्यपरिषद के सदस्यों के नाम तय करने के लिए शासन को पत्र लिखा है।