लखनऊ विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र हर साल परीक्षा नहीं देते हैं इसके बावजूद उन्हें परीक्षा फीस चुकानी पड़ती है। परीक्षा फीस के नाम पर कला संकाय के शोधार्थियों से दो हजार और विज्ञान वर्ग के पीएचडी छात्रों से चार हजार रुपये सालाना वसूले जा रहे हैं।
बगैर परीक्षा पीएचडी छात्रों से परीक्षा शुल्क के नाम पर वसूली क्यों हो रही है इसका जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास नहीं है।
वर्ष 2009 से पहले तक पीएचडी छात्रों को शोध पूरा करने के बाद थीसिस जंचवाने के लिए शुल्क जमा करना होता है। थीसिस जमा करने से पहले कुछ मदों में पीएचडी छात्रों से सालाना फीस ली जाती थी।
यूजीसी के निर्देश पर वर्ष 2009 में पीएचडी के लिए एनरोल होने से पहले कोर्स वर्क पास करने की अनिवार्यता लखनऊ विश्वविद्यालय ने भी लागू की, इसलिए आर्डिनेंस में भी बदलाव कर दिया गया।
कोर्स वर्क के लिए कला और विज्ञान वर्ग के छात्रों से दो हजार रुपये और और विज्ञान वर्ग के छात्र-छात्राओं के लिए चार हजार रुपये फीस निर्धारित की गई थी। कोर्स वर्क पास करने पर ही छात्र-छात्राओं को एनरोल किया जाता है।
एनरोलमेंट के बाद हर वर्ष छात्रों को अपने गाइड से फॉर्म पर स्वीकृति लेकर फीस जमा करनी होती है। शोधार्थियों को परीक्षा देनी नहीं होती है इसलिए सेकंड और थर्ड ईयर में परीक्षा शुल्क जमा करने का सवाल ही नहीं उठता।
इसके बावजूद छात्रों से हर वर्ष परीक्षा शुल्क वसूला जा रहा है। शोधार्थियों ने इसकी शिकायत कार्यकारी वित्त नियंत्रक प्रो. ए चटर्जी से की। शोधार्थियों के अनुसार शुरुआत में उन्होंने वसूली को गलत करार देते हुए फीस वापस करने का भरोसा दिया।
लेकिन बाद में वे भी पलट गए और इस संबंध में कुछ न कर पाने क ी बात कहने लगे। विश्वविद्यालय में इस समय करीब एक हजार शोधार्थी हैं।
साइंस और बाकी वर्ग के छात्रों की संख्या बराबर कर लें तो लविवि उनसे सालाना करीब 30 लाख रुपये की वसूली कर रहा है।
कार्यकारी वित्त अधिकारी प्रो. ए. चटर्जी से इस संबंध में बात करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने बात करने से साफ मना कर दिया।