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एलयू में मैनेजमेंट प्रोफेसर ने चुराया कंटेंट

Fri, 16 May 2014 07:10 AM IST
आशीष त्रिवेदी/अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ विश्वविद्यालय में एमबीए विभाग के प्रोफेसर नीरज कुमार साहित्यिक चोरी के आरोपी पाए गए हैं।
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गुरुवार को कार्यपरिषद की बैठक में अनुशासन कमेटी की रिपोर्ट रखी गई, जिसमें उन्हें साहित्यिक चोरी कर अपना रिसर्च पेपर छापने का दोषी करार दिया गया।

प्रोफेसर को व्यक्तिगत फायदे व प्रमोशन के लिए सत्यनिष्ठा व ईमानदारी का पालन न करने का आरोपी पाया गया। शिक्षकों के लिए बनाए गए कोड ऑफ कंडक्ट को तोड़ने का भी आरेापी पाया गया है।

इस आधार पर एलयू की कार्यपरिषद प्रो. नीरज कुमार को बर्खास्त भी कर सकती है।

हालांकि अभी इस पर अंतिम निर्णय अगली बैठक में लिया जाएगा। कार्यपरिषद के निर्देश पर प्रो. कुमार को नोटिस जारी कर सात दिनों में स्पष्टीकरण मांगा गया है। प्रोफेसर नीरज कुमार दो जून को सेवानिवृत्त भी हो रहे हैं।
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गुरुवार को एलयू की कार्यपरिषद की बैठक में एमबीए विभाग के प्रोफेसर नीरज कुमार पर साहित्यिक चोरी के आरोप की जांच करने के लिए गठित की गई अनुशासन कमेटी की रिपोर्ट रखी गई।

अनुशासन कमेटी में न्यायमूर्ति केएस राखरा, आईएएस अधिकारी वीके मित्तल और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एसबी निमसे शामिल थे। कमेटी की रिपोर्ट में एमबीए विभाग के प्रोफेसर नीरज कुमार पर साहित्यिक चोरी करने का आरोप सिद्ध हुआ है। 

कार्यपरिषद के निर्देश पर प्रो. कुमार को तत्काल नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया।

मालूम हो कि प्रो. नीरज कुमार ने अपना रिसर्च पेपर ह्यूमन डेलेमा ऑफ लीडरशिप में यूएसए के बोस्टन में स्थित हावर्ड बिजनेस स्कूल के एमबीए के प्रोफेसर अब्राहम जेलेनिक के रिसर्च जर्नल से चुराया था।

प्रो. नीरज कुमार ने इस रिसर्च पेपर को जून 1995 में प्रमोशन लेने के लिए प्रकाशित किया था, जबकि हावर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर अब्राहम जेनेलिक ने जुलाई 1963 के अपने रिसर्च जर्नल में छापा था।

प्रोफेसर नीरज कुमार ने अपने रिसर्च पेपर में प्रोफेसर अब्राहम जेनेलिक के रिसर्च जर्नल को हबहू छापा। अनुशासन कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि प्रोफेसर नीरज कुमार ने व्यक्तिगत लाभ के लिए सत्यनिष्ठा व ईमानदारी से समझौता कर गलत ढंग से फायदा लिया है।

लखनऊ विश्वविद्यालय की ओर से शिक्षकों के लिए बनाए गए कोड ऑफ कंडक्ट को भी प्रोफेसर नीरज कुमार ने तोड़ा है। अनुशासन कमेटी की रिपोर्ट के बाद अब प्रोफेसर कुमार के ऊपर बर्खास्तगी की तलवार लटक गई है।

हालांकि, प्रोफेसर कुमार दो जून-2014 को रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें कोई और सजा भी दी जा सकती है। मालूम हो कि साहित्यिक चोरी के इस मामले की जांच यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पहले भी करवाई थी और इनका डिमोशन कर प्रोफेसर से रीडर बना दिया गया था।

लेकिन इस मामले को प्रोफेसर नीरज कुमार ने जब कानूनी चुनौती दी तो कोर्ट ने स्टे दे दिया और यह दोबारा प्रोफेसर बन गए। इसके बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अनुशासन कमेटी का गठन कर मामले की दोबारा जांच की और अब इन्हें साहित्यिक चोरी का दोषी करार दिया गया है।

बैठक से पहले बांटा पर्चा
कार्यपरिषद की बैठक से पहले प्रो. नीरज कुमार की ओर से एक पर्चा वितरित किया गया। इसमें प्रो. कुमार ने अब्राहिम जेनेलिक के पत्र को छापा है, जिसमें उन्होंने वर्ष 1993 में इन्हें रिसर्च जर्नल को इंडिया में छापने का कॉपीराइट दिया है।

फिलहाल, जानकारों की मानें तो एक बार रिसर्च जर्नल छपने के बाद उसे दोबारा छापा ही नहीं जा सकता और यह साहित्यिक चोरी की श्रेणी में आता है।

कुलपति कड़ा संदेश देने के मूड में
एलयू के कुलपति डॉ. एसबी निमसे अनियमितता के इस मामले में सख्त कार्रवाई कर कड़ा संदेश देना चाहते हैं। सिर्फ प्रोफेसर नीरज कुमार ही नहीं बल्कि एप्लाइड इकोनॉमिक्स विभाग के प्रोफेसर नर सिंह के मामले में भी अनुशासन कमेटी की बैठकें चल रही हैं।
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उन पर पीएचडी स्टूडेंट्स ने क्लासरूम में भद्दी बातें करने का आरोप लगाया था। फिलहाल प्रो. नर सिंह भी 30 जून-2014 को रिटायर हो रहे हैं। इन दोनों ही मामलों में कुलपति डॉ. निमसे का रवैया काफी सख्त है।
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