लखनऊ विश्वविद्यालय में कौन से विषय पर शोध कार्य हो चुका है। किस विषय पर शोध चल रहा है।
बीते 10 साल में विश्वविद्यालय ने कितनी पीएचडी अवार्ड की है।
अगर कोई इन सवालों का जवाब जानना चाहता हो तो लविवि प्रशासन के पास इनका कोई जवाब नहीं है।
लखनऊ विश्वविद्यालय की एडमिशन प्रक्रिया तो पूरी तरह से ऑनलाइन हो गई है लेकिन पीएचडी का ब्यौरा ऑनलाइन नहीं हुआ।
इसके इतर विपरीत पुरानी व्यवस्था के तहत छप रही शोध पत्रिका का प्रकाशन जरूर बंद कर दिया गया है।
लखनऊ विश्वविद्यालय ने पारदर्शिता और सुविधा की बात कहते हुए अपनी दाखिला प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन कर दी है।
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कॉलेज डवलपमेंट काउंसिल के तहत सभी कॉलेजों में पढ़ रहे स्टूडेंट और पढ़ा रहे शिक्षकों का डाटाबेस भी तैयार करने पर सहमति बन चुकी है। पर पीएचडी अभ्यर्थियों और उनके द्वारा किस विषय में शोध किया जा रहा है।
इसका डाटाबेस तैयार करने की कोई पहल नहीं की जा रही है। यहां सारा काम अधिकारियों की मनमर्जी और पहुंच वालों के इशारों पर हो रहा है।
सूत्रों के अनुसार पीएचडी अभ्यर्थी और उनके शोध का डाटा बेस तैयार कर लिया जाए तो शोध में फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने में मदद मिले। इसके साथ ही नए शोधकर्ताओं को उनके शोध के क्षेत्र में मदद भी मिलेगी।
नब्बे के दशक तक लखनऊ विश्वविद्यालय में शोध पत्रिका का प्रकाशन होता। हर साल पीएचडी अवार्ड होने वाले अभ्यर्थियों का ब्यौरा दिया जाता था। अभ्यर्थियों के साथ ही शोध का विषय और उनके गाइड का नाम भी होता था।
इस तरह मिलते-जुलते शीर्षक पर पीएचडी करने की आशंका पर रोक भी लग जाती थी। वहीं काफी लंबे समय से शोध कर रहे और अभ्यर्थी निगाह में आ जाते थे।
पत्रिका का प्रकाशन रुकने के कारण इन सारी संभावनाओं पर रोक लग गई। दूसरी तरफ लविवि ने शोधार्थियों पर नजर रखने के लिए कोई नई व्यवस्था भी शुरू नहीं की।
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