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बरसों बाद मिले दोस्त तो याद आए पुराने दिन

Sun, 10 Nov 2013 02:15 AM IST
आशीष त्रिवेदी/लखनऊ
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आज के स्टूडेंट्स भाग्यशाली हैं कि उनके सामने असीमित विकल्प हैं। हर जगह पहले के मुकाबले आर्किटेक्ट की मांग काफी बढ़ी है।
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इसके बावजूद, उनको ध्यान रखना होगा कि कभी चीपेस्ट प्रोडक्ट निशान नहीं बनाता, एक ब्रांड अपनी पहचान बनाता है। इसलिए स्टूडेंट्स को खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करना होगा।
यह बातें गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर के संस्थापक प्राचार्य प्रो. डीसी थापर ने शनिवार को संस्थान की प्रथम एल्यूमनाई मीट के दौरान कही। 
प्रो. थापर शनिवार को गवर्नमेंट कॉलेज में एल्यूमनाइज एसोसिएशन ‘धरोहर’ द्वारा आयोजित पहले एल्यूमनाई मीट के समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस बात की खुशी जताई कि उनको एक बार फिर अपने पुराने स्टूडेंट्स से मिलने का मौका मिला है। 
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अपने पुराने स्टूडेंट्स की सफलता पर प्रो. थापर ने उनको बधाई दी साथ ही वर्तमान स्टूडेंट्स को उनसे सीखने के लिए कहा। एल्यूमनाई मीट में देश-विदेश से एल्यूमनाई आए। इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि यूपीटीयू के कुलपति प्रो. आरके खांडल ने शिक्षण संस्थान को एक पेड़ और स्टूडेंट्स को चिड़िया बताया। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स तो चिड़िया की तरह 4-5 साल में चले जाते हैं लेकिन संस्थान पेड़ की तरह अपनी जगह पर रहता है। 
यह अच्छी बात है कि स्टूडेंट्स वापस आकर देखें कि जिस संस्थान में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है वह कैसे फल फूल रहा है। स्टूडेंट्स किसी भी संस्थान के केयर टेकर होते हैं। 
यहां के एल्यूमनाइज भी अपनी इस भूमिका को अच्छे से निभा रहे हैं। समारोह में संस्थान के प्राचार्य प्रो. जगबीर सिंह ने एल्यूमनाइज की ओर से संस्थान को अब तक दिए गए सहयोग से अवगत कराया। 
उन्होंने कहा कि आज जिस जगह यह समारोह हो रहा है वहां कभी एक बड़ा गड्ढा हुआ करता था। एल्यूमनाइज के सहयोग से ही उसे भरवाकर इस लायक बनाया गया कि यहां इतना बड़ा कार्य क्रम संभव हो सका। 
अरे! यार लाइब्रेरी से चुराई किताबें वापस कर रहे हो गवर्नमेंट आर्किटेक्चर कॉलेज की पहली एल्यूमनाई मीट में आए पूर्व छात्र एक दूसरे की खूब हूटिंग कर रहे थे। जब 1992 बैच के स्टूडेंट्स ने लाइब्रेरी के लिए 125 किताबें दान की तो मंच पर किताब देते समय उसी बैच के कुछ स्टूडेंट नीचे से बोले सर लाइब्रेरी से चुराई गई किताबें वापस कर रहे हैं। 
एक बार स्टॉक जरूर चेक करवा लीजिएगा पुरानी खोई किताबें ही मिलेंगी। इतना कहते ही पूरे पंडाल में ठहाके गूंज उठे। 1992 बैच के स्टूडेंट्स ने वादा किया कि वे हर साल लाइब्रेरी को किताबें दान करते रहेंगे। 
बरसों बाद मिले तो लग गए गले बरसों बाद अपने कैम्पस पहुंचे एल्यूमनाई ने परिसर के हर वो कोना घूमा जहां कभी वे दोस्तों के साथ मस्ती किया करते थे। 1998 बैच के पास आउट नवदीप और देवर्शी ब्वॉयज हॉस्टल घूमने गए तो अचानक ही देवर्शी के मुंह से निकला यार नवदीप अपने वॉशरूम में तो गीजर लग गया। 
हम लोग के टाइम में कितनी समस्या होती थी सर्दियों में। लेकिन नवदीप तो अपने उस रूम को देखने में लगे था जहां उसने 5 साल बिताए थे। वह बोले कि हम अपने-अपने रूम के बेड तोड़कर बॉनफायर करते थे और फिर डांस होता था। कई बार पकड़े गए और हॉस्टल से कुछ दिनों के लिए सस्पेंड भी हुए।
1987 बैच के स्टूडेंट डॉ. संजीव सिंह भी अपने सहपाठियों से घिरे हुए थे। वह बोले कि आज भी हमें याद है कि हॉस्टल में स्टूडेंट्स की समस्या को लेकर हम लोगों ने आंदोलन चलाया और सचिवालय में घुस गए। 
इसके बाद पुलिस ने हमें जेल भेज दिया। वे बोले की उन दिनों टीचर्स व स्टूडेंट के बीच संबंध बहुत अच्छे होते थे। वे हमें पढ़ाई के साथ-साथ नैतिक ज्ञान भी देते थे। 
सचिवालय में घुसने की गलती करने पर हमें डांट पड़ी थी। 1986 बैच के स्टूडेंट आरके द्विवेदी ने जैसे ही पूर्व प्राचार्य प्रो. डीसी थापर को देखा तो तुरंत उनका आशीर्वाद लिया। 
बोले कि हमें अच्छी तरह याद है कि खेल के मैदान में हम सर के साथ फुटबाल या क्रिकेट खेलते हुए भी पढ़ाई करने लगते थे। कई बार सर ने फील्ड में बीच खेल में हमारी क्लास लेना शुरू कर दिया। 
कहां खेलने गए थे और कहां हम खेल-खेल में पढ़ाई करने लगते थे। वहीं 1988 बैच के स्टूडेंट संदीप उप्पल अपनी पत्नी गीता उप्पल के साथ स्टूडेंट एक्टिविटी सेंटर पर फोटो खिंचवा रहे थे। 
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यहां पर उनके पुराने साथी अतुल गुप्ता दिख गए तो दोनों तुरंत एक-दूसरे के गले लग गए। यहां पर पहले से ही एल्यूमनाई की काफी भीड़ थी। सभी एक-दूसरे के साथ फोटो खिंचवाने में जुटे थे ताकि इन यादों को हमेशा संजोकर रख सकें।
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