प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेज छात्रों के लिए तरस रहे हैं। इस बार 54
इंजीनियरिंग कॉलेजों का खाता तक नहीं खुला।
इसमें लखनऊ के भी कुछ
इंजीनियरिंग कॉलेज शामिल हैं। करीब 170 इंजीनियरिंग कॉलेज ऐसे हैं जिसमें
दस सीटें भी नहीं भर पाई हैं। राज्य प्रवेश परीक्षा (एसईई) के अपग्रेडेशन
राउंड के बाद बीटेक कोर्सेज में दाखिले का जो फाइनल रिजल्ट निकला है, वह
कुछ ऐसी ही तस्वीर बयां कर रहा है।
गौतमबुद्ध प्राविधिक विश्वविद्यालय
(जीबीटीयू) द्वारा आयोजित एसईई के तहत इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले की
प्रक्रिया चल रही है।
इंजीनियरिंग कॉलेजों में बीटेक की पढ़ाई से छात्रों
का मोहभंग हो गया है क्योंकि जिन इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें भरी भी
हैं, वहां ज्यादातर सीटें छात्रवृत्ति के तहत निशुल्क दाखिले से भरी गई
हैं।
इनमें दाखिला लेने वाले छात्रों की फीस प्रतिपूर्ति समाजकल्याण विभाग,
पिछड़ा वर्ग विभाग, अल्पसंख्यक विभाग से की जाती है।
आखिर क्या है वजह?
विशेषज्ञ
मानते हैं कि छात्रों के इस मोहभंग का कारण गुणवत्तापरक शिक्षा न मिल पाना
है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में फीस तो काफी वसूली जा रही है लेकिन उन्हें
पढ़ाने के लिए न तो अच्छी फैकल्टी हैं न ही लैब की व्यवस्था।
ऐसे में जब वह
पढ़ाई पूरी कर जॉब के लिए जाते हैं तो उन्हें मायूसी ही हाथ लगती है। इस
वर्ष बीटेक में 1.44 लाख सीटों के मुकाबले फॉर्म भी काफी कम आए थे और
दाखिले के लिए मात्र 56,500 छात्रों ने ही अपनी चॉइस लॉक की।
जीबीटीयू
के कुलपति डॉ. आरके खांडल ने लगातार खराब रिजल्ट दे रहे ऐसे इंजीनियरिंग
कॉलेजों को नोटिस जारी कर रिजल्ट सुधारने की सख्त हिदायत दी थी।
ऐसे
कॉलेजों से हलफनामा लेकर उन्हें आगे रिजल्ट सुधारने की मोहलत दी गई है।
हालांकि, यह मुहिम कितना रंग लाएगी, वक्त ही बताएगा।