देहरादून के डीएवी कालेज का मतलब कभी पढ़ाई होता था लेकिन अब सियासी अड्डा हो गया है। कालेज खुलता नहीं है कि वहां किसी न किसी मामले को लेकर आंदोलन शुरू हो जाता है। इसके बाद पूरे साल आंदोलन ही होता है और पढ़ाई किनारे चली जाती है।
इस साल भी कालेज खुला ही था कि आंदोलन आरंभ हो गया। एक तरफ पढ़ाई करने वाले छात्र एडमिशन के लिए धक्के खा रहे हैं तो दूसरी तरफ सियासत करने वाले कालेज को खुलने नहीं दे रहे हैं। कालेज प्रबंध है कि कुछ करने के बजाए माहौल ठीक होने का इंतजार कर रहा है। पढ़ाई के लिए बढ़ी लड़ाई आखिर कब रुकेगी?
छात्र नेताओं को पसंद नहीं मेरिट पर प्रवेश
डीएवी कालेज में नए सत्र के दाखिलों के लिए प्रास्पेक्टस वितरण आठ जुलाई से शुरू हुआ। प्रास्पेक्टस वितरण 15 मिनट ही चला था कि छात्र नेताओं के विरोध के चलते बंद कर दिया गया। तब से लेकर आज तक कालेज में प्रथम वर्ष में प्रवेश की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।
16 जुलाई को आधिकारिक तौर पर कालेज खुला लेकिन छात्रों ने विरोध स्वरूप प्राचार्य कार्यालय और सभी विभागों में तालाबंदी कर दी गई।
मामले को देखते हुए कालेज प्रशासन ने एमए, एमएससी और एमकॉम की इंटरनल परीक्षाओं पर रोक लगा दी है। यह सब कालेज में मेरिट पर प्रवेश को लेकर हो रहा है। खुलने से पहले ही कालेज प्रशासन ने अनुमन्य सीटों पर मेरिट के आधार पर दाखिले की घोषणा कर चुका था। लेकिन यह बात छात्र नेताओं को पसंद नहीं आई।
डीएवी कालेज की खासियत
डीएवी कालेज का इतिहास गर्व करने वाला रहा है। प्रथम एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री लोकेंद्र बहादुर चांद, पूर्व आर्मी चीफ जनरल बीसी जोशी, मारीशस के पूर्व राष्ट्रपति शिवसागर रामगुलाम सहित तमाम हस्तियों ने इस कालेज से शिक्षा ग्रहण की है। प्रदेश के कई नेताओं ने भी यहीं से पढ़ाई की है। एक समय कालेज अपने अनुशासन और बेहतरीन शिक्षा के लिए जाना जाता था लेकिन इधर कुछ वर्षों से यह छात्र राजनीति का अड्डा बनकर रह गया है।
सियासत ने कर दिया बदनाम
कालेज में एक दशक में छात्र राजनीति ने एक अलग मोड लिया है। छात्र नेताओं की पहुंच प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में काफी अंदर और ऊपर तक बन गई है। छात्र संघ चुनाव में लिंगदोह समिति की सिफारिशों से इतर कई लाख रुपये का खर्च कर अध्यक्ष का चुनाव होता है। सियासत के हावी होने की वजह से कालेज की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है। प्रशासन अगर कोई भी कदम उठाना चाहता है तो उस पर सियासी दबाव डालकर रोक दिया जाता है।
32,000 से अधिक छात्र
वैसे तो विश्वविद्यालय की ओर से अनुमन्य छात्र संख्या 12,500 रखी गई है लेकिन प्रदेश भर के छात्रों के डीएवी कालेज का रुख करने से छात्र संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई। धीरे-धीरे संख्या इतनी बढ़ी कि बीते वर्ष कालेज में छात्रों की संख्या 32 हजार पार कर गई।
पिछले कई वर्षों से कालेज में छात्र संख्या 28 हजार को पार करती रही है। यहां दाखिलों की इतनी संख्या के पीछे एक वजह यह भी थी कि पहले आओ, पहले पाओ की तर्ज पर प्रवेश दिए जाते थे, जिससे प्रदेश के कम प्रतिशत अंक वाले छात्रों को भी आसानी से दाखिला मिल जाता था।
आर्ट-कामर्स के लिए विख्यात
कालेज में बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएमसी, एमकॉम के अलावा सेल्फ फाइनेंस मोड में भी कुछ कोर्स चलाए जाते हैं। बीए में दून के सभी कालेजों में सबसे ज्यादा विषयों का कांबिनेशन है। बीएससी में भी पीसीएम, सीबीजेड और पीएमजी ग्रुप मौजूद है। एमए में हिंदी, अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं।
कभी शिक्षा, अब छात्र संख्या के लिए प्रसिद्ध
डीएवी कालेज को पहले बेहतर अनुशासन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए जाना जाता था। लेकिन पिछले करीब छह वर्षों से कालेज की नई पहचान सबसे बड़ी छात्र संख्या वाले कालेज के तौर पर हुई है। जानकारों का मानना है कि डीएवी की 32 हजार से ज्यादा छात्र संख्या होने की वजह से यह न केवल उत्तराखंड बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी सबसे बड़ा कालेज माना जाता है।
शिक्षा सचिव से मिले दोनों प्राचार्य
डीएवी कालेज के प्राचार्य डा.देवेंद्र भसीन और डीबीएस कालेज के प्राचार्य डा.ओपी कुलश्रेष्ठ ने बुधवार को प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा से मुलाकात की। उन्होंने कालेज के हालात की रिपोर्ट सौंपी। डा. भसीन ने बताया कि प्रमुख सचिव के अति व्यस्त कार्यक्रम के चलते उनसे मामले पर ज्यादा बात नहीं हो सकी। दूसरी ओर, कालेज बंद होने के बावजूद डीबीएस में छात्र संघ का धरना जारी रहा।
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