इराक में जारी हिंसा के जल्द थमने के संकेत न मिलने के बीच विद्रोहियों और सरकार के बीच संघर्ष तेज होने से भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा पैदा हो गया है।
सऊदी अरब के बाद इराक भारत के लिए कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश है। तेल की बढ़ती कीमतों और डॉलर की मजबूती के कारण सरकार का पेट्रोलियम सब्सिडी बिल अनियंत्रित होने, मुद्रास्फीति बढ़ने और व्यापार घाटा और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
सोमवार को रुपये की कीमत 60 प्रति डॉलर के को पार गई और कच्चे तेल की कीमतें 113 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी हैं। संकेत मिल रहे हैं कि इराक संकट कुछ समय तक बना रह सकता है। ऐसे में भारत को कुछ समय के लिए ऊंची तेल कीमतों के साथ ही रहना होगा।
एक सरकारी तेल विपणन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अगर डॉलर की मजबूती बढ़ती है और कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा जारी रहता है, तो सरकार के पास पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाने या आगामी बजट में भारी पेट्रोलियम सब्सिडी की व्यवस्था करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।
उधर, इराक की स्थिति में जल्द सुधार की उम्मीद नहीं दिख रही है। भारत इराक से 24-25 मिलियन टन सालाना कच्चे तेल का आयात करता है। यह देश की कुल तेल जरूरतों का 17 फीसदी है। इराक 2012 में ईरान को पीछे छोड़ कर भारत को सबसे ज्यादा तेल आपूर्ति करने वाला दूसरा बड़ा देश बन गया था। इसके बाद से इराक नई दिल्ली को लगातार तेल की आपूर्ति बढ़ा रहा है और भारतीय रिफाइनरी की मांग पूरी कर रहा है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इराक में राजनीतिक घटनाक्रम हमारे लिए चिंता का कारण है और हम इस पर नजर रख रहे हैं। मौजूदा संकट के चलते इराक से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होना तय है। भारत अपने नागरिकों को पहले ही इराक छोड़ने को कह चुका है। भारत सरकार और रिफायनरियों को चिंता में डालने वाला तथ्य यह है कि इराक का तेल उत्पादन करने वाला प्रमुख शहर किरकुक विद्रोहियों के कब्जे में आ चुका है और वे दूसरे इलाकों पर कब्जा करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
इराक से तेल खरीदने वाली भारतीय रिफाइनरी जैसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और एस्सार ऑयल भी स्थिति पर नजर रख रहीं हैं। इनका मानना है कि इराक का यह घटनाक्रम एक अस्थाई स्थिति हो सकती है, लेकिन अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो इससे ईंधन सब्सिडी नियंत्रण से बाहर हो जाएगी और इससे सरकार की दिक्कतें बढ़ेंगी।
जहां तक रुपये का सवाल है, रुपये में पिछले चार में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। तेल कीमतों में और वृद्धि की आशंका को देखते हुए तेल आयातक डॉलर खरीदने में जुट गए हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें रिफायनरियों की लागत में इजाफा करेंगी। भारत अपनी ईंधन की जरूरतों का तीन-चौथाई आयात के जरिए पूरी करता है और आयात बिल बढ़ने से व्यापार घाटा बढ़ेगा, जिससे महंगाई का खतरा पैदा हो जाएगा।
भारत तेल की कुल जरूरतों का 85 फीसदी आयात के जरिए पूरी करता है और तेल की कीमतों में और वृद्धि से डीजल को नियंत्रण मुक्त करने की सरकार की योजना पर पानी फिर सकता है। इसके अलावा घरेलू स्तर पर ईंधन की खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं होता है, तो ईंधन सब्सिडी बहुत बढ़ जाएगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का कहना है कि ओपेक को वैश्विक बाजार को संतुलित रखने के लिए 2014 की दूसरी छमाही में प्रतिदिन औसतन 10 लाख बैरल तेल प्रतिदिन ज्यादा उत्पादन करना होगा। इसका कारण सीजन में तेल की मांग बढ़ना है।