थोक महंगाई दर मई में पांच माह के उच्च स्तर 6.01 फीसदी पर पहुंच गई। महंगाई में इजाफे की मुख्य वजह खाने-पीने की चीजों और ईंधन के दाम में बढ़ोतरी रही है। मौसम विभाग पहले ही इस बार मानसून के दौरान सामान्य से कम वर्षा होने की भविष्यवाणी कर चुका है।
उधर, इराक में फिर से हिंसा भड़कने की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ दिन के दौरान आए उबाल ने ईंधन के दामों को फिर से हवा दे दी है और कच्चा तेल 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गया है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाने का फैसला किया है।
यह कदम मुख्य रूप से दो प्रकार के हैं। पहला, निर्यात को हतोत्साहित करना जिससे घरेलू उपलब्धता बढे़ और दूसरा, देश में कालाबाजारी और कीमतों की कृत्रिम बढ़ोतरी को रोकना।
निर्यात को हतोत्साहित करने की कवायद
सरकार ने प्याज, आलू, चावल और दूध के निर्यात को रोकने की तैयारी शुरू की दी है। हाल ही में सरकार ने खरीफ सीजन में प्याज के पैदावार के प्रभावित होने की आशंका के बीच प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 300 डॉलर प्रति टन तय कर दिया।
वहीं, सरकार ने आलू का एमईपी भी बढ़ाकर 450 डॉलर प्रति टन कर दिया है। इसके अलावा, दूध के दामों में वृद्धि को रोकने के लिए निर्यात में दी जा रही रियायतों को रोकने के फैसले के बारे में सोचा जा रहा है।
हालांकि, ऐसे निर्यात पर प्रतिबंध लगाने वाले कदम अल्पावधि में घरेलू कीमतों में गिरावट ला सकते है, लेकिन मध्य अवधि और दीर्घावधि में देश के विकास में रुकावट साबित होते हैं और इनसे हुए नुकसानों मसलन, निर्यातकों की क्षमता और दक्षता में गिरावट, अन्य देशों के निर्यातकों की बाजार में पैठ जमना आदि की भरपाई बेहद मुश्किल हो जाती है।
कालाबाजारी और कीमतों में कृत्रिम बढ़ोतरी पर रोक
सरकार द्वारा कालाबाजारी और दामों में कृत्रिम बढ़ोतरी को रोकने के लिए कदम त्वरित और दूरगामी सोच से प्रभावित हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार 22 जिंसों (कमोडिटी) पर, जिनकी कीमतों में भारी उठापटक रहती है, सरकार की पैनी नजर रहेगी।
इनकी जमाखोरी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दिल्ली में फल एवं सब्जियों को कृषि उत्पाद विपणन समिति के दायरे से हटा दिया गया है। राज्य सरकार से प्याज की कीमतों पर निगरानी रखने के लिए कहा गया है। इसके अलावा फॉरवर्ड मार्केट कमीशन (एफएमसी) ने जुलाई, अगस्त और सितंबर के आलू के वायदे कारोबार पर रोक लगा दी है।
इस नियम के बाद आलू की कीमतों में 150 रुपये तक की गिरावट दर्ज की गई है। सरकार ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के गोदामों में हर साल सड़ जाने वाले अनाज को लेकर भी चिंता जताई, लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिए उचित प्रयासों की आवश्यकता है।
सरकार को कड़े फैसले लेने की जरूरत
सरकार द्वारा कालाबाजारी और कीमतों में कृत्रिम वृद्धि रोकने के प्रयास सराहनीय है। हालांकि, ऐसे अनेक कड़े फैसले करने की आवश्यकता है। ऐसे फैसले दूरगामी सोच के साथ नीतिगत एवं ढांचागत सुधारों को लक्ष्य बनाकर करने होंगे। इनमें से कुछ हैं -
बफर स्टॉक में से चावल और गेहूं के उत्पादन को बाजार में उतारने के लिए स्पष्ट नीति बनाना
न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति में संशोधन और न्यूनतम समर्थन मूल्य की बजाय पैदावार को बढ़ाने पर ध्यान देना
उच्च कोटि की फसलों के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों से निवेश को बढ़ावा देना
किसानों द्वारा फलों और सब्जियों के लिए प्राप्त कीमतों और उपभोक्ता के द्वारा भुगतान की गई कीमतों में एक बड़ा अंतर है। इसे पाटने के लिए कृषि उपज विपणन समितियों में सुधारों की जरूरत है। बिचौलियों को कम करना और एपीएमसी मॉडल अधिनियम से फलों और सब्जियों को बाहर रखने के लिए आवश्यक सुधार करना जरूरी है
खाद्य भंडारण और प्रोसेसिंग में ढांचागत सुधारों को लाना। इसके लिए बेहतर परिवहन सुविधाएं और कोल्ड स्टोरेज में निवेश की आवश्यकता है
विभिन्न विभागों, जैसे की कृषि, नागरिक आपूर्ति, वित्त, वाणिज्य आदि, में समन्वय। इसी के साथ राज्य सरकारों की साथ कदम मिलाकर चलना
कुशल संचार व्यवस्था जिससे की वस्तुओं की कमी और बहुलता वाले क्षेत्रों की जानकारी मिल सके और ऐसी वस्तुओं का स्थानांतरण करना
राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा नीति को लागू करना जिससे सरकारी विभाग और नियामक पारदर्शी, बाजारोन्मुख और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने लायक नीतियां और नियम बनाएं। इसी के साथ विभागों और नियामकों को जवाबदेह बनाना और मौजूदा नीतियों और नियमों के प्रतिस्पर्धा पर प्रभावों को आकलन कर, प्रतिस्पर्धा विरोधी पहलुओं का संशोधन करना