देश में मैन्यूफैक्चरिंग की रफ्तार और रोजगार सृजन में श्रम कानूनों की अहमियत को समझते हुए मोदी सरकार इसमें बड़े सुधार करने की तैयारी कर रही है।
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सरकार का मानना है कि श्रम कानूनों में सुधारों के बगैर बड़े निवेश आकर्षित करना मुश्किल है। हालांकि श्रमिक संगठनों की ओर से सरकार की इस मंशा का क़ड़ा विरोध हो रहा है।
माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रम मंत्रालय और पीएमओ को श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर सुधार के लिए रोडमैप तैयार करने को कहा है।
जून के पहले सप्ताह में केंद्रीय श्रम मंत्री ने फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 की धारा 61 में प्रस्तावित 54 संशोधनों पर आम लोगों से टिप्पणियां आमंत्रित की थी। फैक्ट्रीज केंद्रीय कानून है लेकिन इसे राज्य सरकारें लागू करती हैं। इन संशोधनों के मुताबिक फैक्ट्री के मालिक को किसी भी विस्तार के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी।
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राजस्थान में 15 लाख नौकरी देने का वादा
एक नए प्रावधान के तहत केंद्र के पास कामगारों और कार्यस्थल पर सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुडे़ अहम पहलुओं पर कानून बनाने का अधिकार होगा।
हालांकि इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि कैबिनेट या संसद की मंजूरी के लिए पेश किए जाने वाले इन संशोधनों में खासा संशोधन हो सकता है। राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने श्रम कानूनों में सुधारों की शुरुआत कर दी है।
वसुंधरा सरकार ने 15 लाख नौकरियों का वादा किया है। लिहाजा श्रम कानूनों को लचीला बनाने के लिए उसने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, कारखाना (फैक्ट्री) अधिनियम, 1948 और ठेका मजदूर कानून, 1971 में व्यापक संशोधन का फैसला किया है।
दिल्ली-मुंबई फ्राइड एंड इंडिस्ट्रयल कोऱिडोर का 39 फीसदी राजस्थान में पड़ता है। यही वजह है कि राजे सरकार श्रम सुधारों पर जोर दे रही है।
300 कर्मचारियों तक की छंटनी अपनी मर्जी से
दरअसल विदेशी निवेशक मौजूदा श्रम कानूनों के रहते कोरिडोर से लगे इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश से हिचकिचा रहे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा कानून कंपनियों के हितों के खिलाफ हैं और निवेशकों को प्रताड़ित करने के लिए श्रमिक संगठन अक्सर इनका इस्तेमाल करते हैं।
श्रम कानून समवर्ती सूची में हैं। कई बार राज्यों की ओर से किए गए सुधारों को मंजूरी देने में केंद्र अपनी अहमियत जाहिर करता रहा है। अगले महीने राजस्थान सरकार के संशोधन केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति की अनुमति के लिए भेजे जाएंगे।
औद्योगिक विवाद अधिनियम के नए संशोधनों के मुताबिक अब तीन सौ कर्मचारियों तक की छंटनी के लिए सरकार की अनुमति की जरूरत नहीं होगी। मौजूदा कानून में 100 कर्मचारियों तक की छंटनी के लिए सरकार की अनुमति नहीं लेनी पड़ती है। जहां तक ठेका मजदूर कानून का सवाल है तो यह अब मौजूदा 20 श्रमिकों की तुलना में 50 कर्मचारियों पर ही लागू होगा।
कानून में करना होगा बदलाव
संविधान की धारा 254 (2) के तहत राज्य को इस संबंध में कानून बनाने के लिए केंद्र की अनुमति लेनी होगी। दरअसल गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी भी कई बार यह शिकायत कर चुके हैं कि केंद्र उनकी सरकार की ओर से किए गए सुधारों को अनुमति देने से कतराता रहा है।
अगर राजस्थान सरकार के संशोधनों को केंद्र ने मंजूरी दे दी तो दूसरे राज्यों की ओर से भी इस ओर पहल की जा सकती है। बहरहाल, राजस्थान और केंद्र सरकार श्रम कानूनों में संशोधनों पर गंभीर है लेकिन ट्रेड यूनियनों की ओर से इसका जबरदस्त विरोध हो रहा है।
एटक के सचिव डी.एल. सचदेवा ने इसे राजस्थान में उद्योगों को भाजपा की ओर से दिया जाने वाला उपहार बता रहे हैं। उनका कहना है कि श्रम कानूनों में संशोधनों से कंपनियों को मजदूरी, कामगारों की सुरक्षा और रोजगार की सुरक्षा के नियमों से खिलवाड़ करने की खुल्लम-खुल्ला छूट मिल जाएगी।
विश्व बैंक की 2014 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में भारत के श्रम बाजार के कानून काफी कड़े हैं। कामगारों की भलाई के लिए कानून तो हैं लेकिन अक्सर इसका उल्टा असर होता है क्योंकि ज्यादातर कंपनियां छोटा रह कर श्रम कानूनों के दायरे से बचना चाहती है।
सरकार का कहना है कि देश की दो लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यव्स्था में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी 15 फीसदी है। इसे वह बढ़ा कर 25 फीसदी करना चाहती है। यही वजह है कि वह मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को रफ्तार देने के लिए श्रम कानूनों में संशोधन के पक्ष में है।