खाद्य सुरक्षा और किसानों के नाम पर मोदी सरकार ने भले ही विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के व्यापार समझौते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, लेकिन खेती और किसानों के मुद्दों पर सरकार के रवैए से किसान संगठनों की नाराजगी बढ़ती जा रही है।
भारतीय किसान यूनियन ने भारतीय जनता पार्टी पर चुनाव के दौरान किसानों से किए वादों की अनदेखी का आरोप लगाया है, जबकि अखिल भारतीय किसान सभा का कहना है कि खाद्य सुरक्षा के मामले में केंद्र सरकार दोहरी नीति अपना रही है। डब्ल्यूटीओ में भारत खाद्य सुरक्षा के नाम पर व्यापार समझौते का विरोध कर रहा है, जबकि देश के अंदर मोदी सरकार ने किसानों को ज्यादा कीमत देने वाले राज्यों में अनाज की सरकारी खरीद बंद करने की चेतावनी दी है। ऐसे में केंद्र सरकार को खाद्य सुरक्षा, कृषि सब्सिडी और उपज की सरकारी खरीद को लेकर अपनी नीति को स्पष्ट करना चाहिए।
अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अमरा राम का कहना है कि डब्ल्यूटीओ के समझौते का विरोध कर केंद्र सरकार किसानों की हिमायत का संदेश देना चाहती है,जबकि हकीकत इसके उलट है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के ऊपर बोनस देने वाले राज्यों को मोदी सरकार ऐसा करने से रोक रही है। कृषि मंत्रालय और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग भी फसलों के समर्थन मूल्य नहीं बढ़ने दे रहे हैं। कृषि सब्सिडी और अनाज की सरकारी खरीद कम करने की कोशिशें चल रही हैं। किसान सभा ने डब्ल्यूटीओ में भारत की ओर से गुप्त समझौते की आशंका भी जताई है।
हालांकि, भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) ने डब्ल्यूटीओ में भारत के कदम का समर्थन किया है। लेकिन भाकियू के महासचिव युद्धवीर सिंह ने कहा है कि मोदी सरकार किसानों से किए वादों को पूरा करती नहीं दिख रही है। सरकार ने अपने कार्यकाल के 70 दिन पूरे कर लिए हैं, लेकिन किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसदी मुनाफे का वादा पूरा करने की दिशा में कोई कदम नहीं बढ़ाया है।
भाजपा और संघ से जुड़े किसान संगठन भी इस चुनावी वादे को जल्द से जल्द पूरा करने की मांग कर रहे हैं। एमएसपी में मोदी सरकार की ओर से की गई मामूली वृद्धि भाजपा के घोषणा-पत्र और किसान दोनों के साथ धोखा है। भाकियू ने भी राज्य सरकारों को एमएसपी के ऊपर किसी भी प्रकार का बोनस देने पर रोक लगाने के मोदी सरकार के निर्देश का कड़ा विरोध किया है।