फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘मेक इन इंडिया’ को रफ्तार देंगे यूएस से रिश्ते

Mon, 17 Nov 2014 09:27 AM IST
नई दिल्ली /ब्यूरो
विज्ञापन
विज्ञापन
डॉ. विवेक लाल एक जाने-माने एयरोस्पेस एवं रक्षा विशेषज्ञ हैं। बोइंग, रिलायंस, रेथिऑन जैसी कंपनियों में कई अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके डॉ. लाल फिलहाल अमेरिका की रक्षा, सौर एवं परमाणु क्षेत्र की कंपनी जनरल एटॉमिक्स के साथ जुड़े हुए हैं। हाल ही में उन्होंने जनरल एटॉमिक्स बतौर ग्लोबल चीफ एक्जीक्यूटिव ज्वाइन किया है। वह जनरल एटॉमिक्स इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम्स के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक रणनीतिक संवर्धन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कैंब्रिज ने डॉ. लाल को बीसवीं सदी के दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों में शामिल किया। भारत यात्रा के दौरान डॉ. लाल ने अमर उजाला के कार्यकारी संपादक एमके वेणु से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश अमेरिका के साथ रक्षा क्षेत्र में मजबूत रिश्ते पीएम मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को सफल बना देंगे। पर कैसे, पढ़िए इस साक्षात्कार में?-
विज्ञापन


सवाल : हाल ही में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान आप उनके साथ थे। वहां प्रधानमंत्री भारत और अमेरिका के बीच संबंध और मजबूत करने के लिए तमाम कंपनियों के सीईओ से मिले। भारत के साथ रणनीतिक तकनीक व्यापार पर आपकी उनके साथ और अन्य सरकारी प्रतिनिधियों के साथ चर्चा हुई। वर्तमान में आपको कैसी संभावना दिखाई दे रही है?

जवाब : मेरा मानना है कि कॉरपोरेट वर्ल्ड में यह देखने के लिए एक नया उत्साह है कि भारत और अमेरिका प्रौद्योगिकी और नवाचार के नजरिए से परस्पर कैसे जुड़ सकते हैं। अमेरिका में ऐसी कई कंपनियां हैं जिनके पास रक्षा सहित विभिन्न उद्योगों के लिए आला प्रौद्योगिकी है। इसलिए, यह अहम है कि आप उनके साथ भागीदारी कैसे करते हैं जहां तकनीक भारतीय उद्योग, कॉरपोरेट सेक्टर और रक्षा सेक्टर के लिए सही मायने में लाभकारी हो सकती है। इसका एक पहलू यह होगा कि इस अवधारणा में कोई कंपनी कैसे नवाचार लाती है और फिर उसे अगले स्तर पर ले जाती है।
विज्ञापन


सवाल : प्रधानमंत्री और उनकी टीम द्वारा शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ योजना को आप कैसे देखते हैं?

जवाब : यह एक बहुत सराहनीय कोशिश है और नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा उठाया गया एक बड़ा कदम है। यह पहल उन तमाम अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित करेगी, जो भारत और भारत को आधार बनाकर दुनिया के अन्य देशों के लिए सह-विनिर्माण और उत्पादों के को-डेवलपमेंट की इच्छुक हैं। दोनों देशों की सरकार एक फैसिलिटेटर की भूमिका निभा सकती है, क्योंकि आखिरकार दोनों देशों के बीच कारोबार प्रौद्योगिकी क्रांति की अगुवाई करेगा।

सवाल : ‘मेक इन इंडिया’ ड्रीम को हकीकत में तब्दील करने के लिए किन जरूरी कदमों की आवश्यकता है। जनरल एटॉमिक्स रक्षा एवं परमाणु प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी कंपनी है। आप स्वयं सौर ऊर्जा अनुसंधान और सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा बनाने वाले उत्पाद विकसित करने में लंबे समय तक जुड़े रहे। आप निकट भविष्य में इन मोर्चों पर बन रही चीजों को कैसे देखते हैं?

जवाब : रक्षा और परमाणु उद्योग में अधिकांश प्रौद्योगिकी और मैन्यूफैक्चरिंग योजना को मूर्त रूप लेने में कई साल लग सकते हैं, क्योंकि इन्हें स्थापित करने और इनसे उत्पादन शुरू होने में लंबा समय लगता है। अगले दो से तीन साल में यह किया जा सकता है, कि इसके बीज जमीन में बोए जा सकते हैं और उन्हें विकसित होने में हर जरूरी संरक्षण दिया जा सकता है। इसके नतीजे तत्काल नहीं मिलेंगे लेकिन उन परियोजनाओं को चिह्नित करने की आवश्यकता है, जिन्हें सरकार और भारत एवं अमेरिका की कंपनियों द्वारा संयुक्त रूप से निष्पादित किया जा सकता है। मैं जानता हूं, जब मोदी वाशिंगटन में थे रक्षा प्रौद्योगिकी पहल (डीटीआई) पर बहुत-सी बातें हुईं। क्योंकि ऐसी कई रक्षा परियोजनाएं हैं, जो इसका हिस्सा बन सकती हैं। यदि हम अभी इसके बीज बोते हैं तो आगे जाकर एक प्रतिस्पर्धी इंडस्ट्री तैयार होगी। तब चाहें आपके पास ऑफसेट पॉलिसी हो या न हो कंपनियां भारत आएंगी और यहां बेस बनाएंगी। अमेरिकी कंपनियां भारत आने और भारत को दुनिया के अन्य हिस्सों के लिए निर्यात हब के रूप में विकसित करने के लिए बहुत आशावादी हैं।

सवाल : पूर्ण परमाणु प्रौद्योगिकी साझेदारी के रास्ते में आने वाली कुछ दिक्कतों के बारे में बताइए। न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल को आप कैसे देखते हैं, जोकि भारत और अमेरिका के बीच मजबूत साझेदारी की राह में एक बड़ी बाधा है।

जवाब : पिछले कई वर्षों में इस क्षेत्र में ढेर सारी प्रगति हुई है। कॉरपोरट का नजरिया जोखिम बनाम पारितोषिक ढांचे का है, जिस पर विचार करने की जरूरत है। मैं इसे एक ऐसी बाधा के रूप में नहीं देखता, जिसे दूर नहीं किया जा सकता है। आज की तारीख में हर कोई जोखिम प्रबंधन कैसे किया जाए, इसमें लगा हुआ है। एकबार जोखिम से जुड़े मुद्दों का समाधान हो जाने पर मैं भविष्य में इस दिशा में सही मायने में की जाने वाली प्रगति देखता हूं। इसे बैलेंस शीट से बाहर रखा जा सकता है। रक्षा से जुड़े न्यूक्लियर लायबिलिटी या लायबिलिटी क्लाजेज के संदर्भ में मेरा मानना है कि यह मामला नियमों को कैसे तैयार और साझा सामूहिक जिम्मेदारियों का चयन किया जाए, इसका है। भविष्य में यह सही रास्ते पर दिखाई देगी। यह भारत और शेष दुनिया के लिए कई तरह से लाभकारी है, क्योंकि इसके तहत कई तरह की प्रौद्योगिकी साझा की जानी है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें