देश की अर्थव्यवस्था सुस्ती के भंवर में फंसती जा रही है। इस साल अप्रैल से जून के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर सिर्फ 4.4 फीसदी रही, जो पिछले 4 साल वर्षों में सबसे कम है।
आर्थिक तरक्की का पैमाना मानी जाने वाली विकास दर में कमी के पीछे मैन्युफैक्चरिंग और खनन क्षेत्र में सुस्ती बड़ी वजह है। पिछली तीन तिमाहियों से विकास दर लगातार 5 फीसदी से नीचे बनी हुई है।
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी गिरावट
केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 1.2 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि इससे पिछली तिमाही में 2.6 फीसदी वृद्धि हुई थी।
ऐसा ही हाल खनन क्षेत्र का रहा, जिसमें 2.8 फीसदी की कमी आई है। आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से 7 में पिछले साल के मुकाबले कमी आई है।
अर्थव्यवस्था के मूड को जाहिर करने वाले कंस्ट्रक्शन क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले साल जुलाई के 7 फीसदी के स्तर से गिरकर 2.8 फीसदी पर आ गई है। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर भी 2.9 से घटकर 2.7 फीसदी रह गई।
आर्थिक मामलों के सचिव अरविंद मायाराम का कहना है कि सरकारी खर्च पटरी पर आ गया है, इससे अगली तिमाही में विकास दर बढ़ने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस साल विकास दर 5.5 फीसदी रहने का दावा किया है।
खतरे की घंटी
गत वित्त वर्ष में दशक की सबसे कम 5 फीसदी विकास दर रही थी। पिछली तीन तिमाही में जिस तरह वृद्धि दर 5 फीसदी से कम बनी हुई, उससे यह साल और भी बुरा साबित हो सकता है। गत अप्रैल से जून के दौरान विकास दर अनुमानों से काफी कम रही है। यह खतरे की घंटी है।
बिगड़ चुका है निवेश का माहौल
उद्योग जगत ने आर्थिक विकास दर में आई सुस्ती के लिए सरकार की नीतियों और निवेश के बिगड़ते माहौल को जिम्मेदार ठहराया है। उद्योगों ने मैन्यूफैक्चरिंग की हालत पर गहरी चिंता जताई है।
चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 4.4 फीसदी रही, जो पिछले चार साल में सबसे कम है। पिछले वित्तवर्ष की इसी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 5.4 फीसदी थी।
उद्योग संगठन फिक्की की अध्यक्ष नैना लाल किदवई का कहना है कि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की बाधाएं चिंताजनक हैं। ऐसे में 4.4 फीसदी के आंकड़े से हैरानी नहीं होनी चाहिए। जीडीपी के आंकड़ों से साफ है कि अर्थव्यवस्था के सामने कई मुश्किलें हैं।
देश के निवेश का माहौल खराब है। इस साल बेहतर मानसून से कृषि क्षेत्र की विकास दर में बढ़ोतरी की उम्मीद है। हालांकि, हमें मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हालत सुधारने के लिए सुधार के सख्त फैसले करने होंगे। सरकार को अभी चुनावी मूड में नहीं जाना चाहिए।
पटरी से कैसे उतरी अर्थव्यवस्था
- आर्थिक सुधारों की ओर सुस्त कदम, फैसलों में देरी।
- 200 से ज्यादा मेगा प्रोजेक्ट अटके।
- मकड़जाल में फंसी 7 लाख करोड़ रुपए के निवेश की मंजूरी।
- डीटीसी जैसे अहम सुधार कई साल से ठंडे बस्ते में।
- मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ टैक्स को लेकर झगड़े।
- एफडीआई की राह खुलने के बावजूद निवेश कम।
- उद्योगों पर महंगे ब्याज, सस्ते श्रमिकों की कमी की मार।