वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने जो बजट पेश किया है, उसे लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चिदंबरम के बजट की प्रशंसा की है, लेकिन अगर एक इंटरप्रेन्योर की नजर से इस बजट को देखा जाए तो दो बातें कही जा सकती हैं। पहली बात तो यह है कि इस बजट को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। दूसरे, इस बजट से घबराने की भी जरूरत नहीं है।
दरअसल, एक इंटरप्रेन्योर अर्थव्यवस्था को समग्र तौर पर देखता है। लेकिन जिस तरह का बजट पेश किया गया है, उससे विकास की एक समग्र तस्वीर बनाना मुमकिन नहीं है। बजट में बहुत सी घोषणाएं की गई हैं, लेकिन उनको किस प्रकार अंजाम देना संभव होगा, इस पर वित्त मंत्री ने कोई प्रकाश नहीं डाला। बजट में जो भी घोषणाएं की गई हैं, वे पहले से ही प्रत्याशित थीं। विकास दर को 5 प्रतिशत से आगे ले जाने की बात तो की गई है लेकिन इसकी कोई पुख्ता योजना इस बजट में नहीं दिखाई देती।
अगर, निवेश के मोरचे पर देखा जाए तो इसमें संदेह नहीं है कि देश के आर्थिक विकास के लिए निवेश को बढ़ावा देना जरूरी है। लेकिन इस निवेश का वित्तीयन घरेलू बचत के माध्यम से होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि बाहरी निवेश का महत्व नहीं होता, लेकिन समग्र विकास के लिए बाहरी निवेश और घरेलू बचत में एक संतुलन होना चाहिए।
वाह्य निवेश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने से चालू खाता घाटा बढ़ने लगता है। इसी वजह से तेल और खाद्य जैसी मदों में मूल्यों में इजाफा होने लगता है। यह उम्मीद की जा रही थी कि चिदंबरम अपने बजट में घरेलू बचत को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय कदम उठाएंगे। लेकिन बजट में इस दिशा में भी कोई खास पहल दिखाई नहीं देती।
यह सच है कि इसे चुनावी बजट नहीं कहा जा सकता और इसे अर्थव्यवस्था को उठाने वाला बजट माना जा रहा है। वित्त मंत्री ने अपने बजट में राजकोषीय घाटे को कम करने का भरसक प्रयास किया है। लेकिन फिर भी काफी कुछ अनुमानों पर ही निर्भर है, जिनकी विश्वसनीयता को समय की कसौटी पर खरी उतरे, ऐसी हम उम्मीद ही कर सकते हैं।