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सुधारों के अभाव में पटरी से उतरा विनिवेश कार्यक्रम

Tue, 02 Dec 2014 09:22 AM IST
सुजय मेहदूदिया/नई दिल्ली
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शेयर बाजार में तेजी के नए-नए रिकॉर्डों के बावजूद मोदी सरकार का विनिवेश कार्यक्रम पटरी से उतरता दिखाई दे रहा है। इस साल सितंबर में मोदी सरकार ने कोल इंडिया, ओएनजीसी, सेल और एनएचपीसी जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर 45,000 करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद जताई थी। लेकिन तीन माह बीत जाने के बावजूद सरकार न केवल विनिवेश के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है, बल्कि शेयर बिक्री के जरिए मुश्किल से वह 35,000 से 36,000 करोड़ रुपये जुटाने की स्थिति में दिखाई दे रही है। विनिवेश कार्यक्रमों के परवान न चढ़ने की मुख्य वजह आर्थिक सुधारों को रफ्तार न दे पाना है।
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वास्तव में इस विनिवेश कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘मिनिमम गवर्नमेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा बुरी तरह विफल साबित हुआ है। यद्यपि, सरकार ने विनिवेश की दिशा में कदम बढ़ाए लेकिन पूरी तरह राजनीतिक नियंत्रण वाली इन सरकारी कंपनियों के लिए सुधारों की घोषणा कर पाने में विफल रही। यह सरकारी कंपनियां प्रशासनिक और वित्तीय दोनों ही रूप में गैर पेशेवर रूप में संचालित हो रही हैं।

शेयर बाजार अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है लेकिन सरकारी कंपनियों के शेयरों में गिरावट आ रही है, जिसके चलते सरकार के विनिवेश कार्यक्रम को पूरा करना मुश्किल हो गया है। ओएनजीसी में विनिवेश दिसंबर के पहले सप्ताह और उसके बाद सीआईएल में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचने वाली थी लेकिन अब इसे जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया गया है।
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सितंबर में जब सरकार ने ओएनजीसी के शेयर बिक्री की घोषणा की थी तो उसका शेयर भाव 455 रुपये था, जो अब 380 रुपये पर कारोबार कर रहा है। सीआईएल, सेल और विनिवेश की कगार में खड़ी अन्य दूसरी सरकारी कंपनियों के मामले में भी हालात इससे जुदा नहीं हैं। निवेशक और बाजार इन कंपनियों के शेयरों में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। क्योंकि, सरकार ने अभी तक इन कंपनियों की वित्तीय स्वायत्तता जैसी कार्यप्रणालियों में सुधार नहीं किया है साथ ही अपना प्रशासकीय नियंत्रण भी कम नहीं किया है। एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि सुधारों के अभाव में सरकार के विनिवेश कार्यक्रम और सरकारी कंपनियों से फंड जुटाने की योजना को बुरी तरह झटका लगा है।

भारी जनादेश के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली जीत से सप्ताह भर पहले ही बाजार यह भांप गया था कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ही अगली सरकार बनेगी। इसके चलते बाजार के संवेदी सूचकांकों में तगड़ी तेजी आई और यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। गत 8 मई से अबतक सेंसेक्स 27.04 फीसदी और निफ्टी 27.27 फीसदी बढ़त बना चुका है। हालांकि, सरकारी कंपनियों के सूचकांकों में बाजार की इस तेजी के अनुरूप प्रदर्शन नहीं दिखाई दिया।

सुधारों के अभाव में सरकारी कंपनियों के शेयरों में गिरावट आनी शुरू हुई। सरकार को अपना विनिवेश कार्यक्रम पूरा करने के लिए महज चार महीने शेष बचे हैं। सरकार बमुश्किल से कुछ कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने की जद्दोजहद कर रही है। वास्तव में, हालात ऐसे हैं कि कंटेनर कार्प, रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कार्प और पावर फाइनेंस कार्प में शेयर बिक्री पर अभी कोई स्पष्टता नहीं है। ऐसे हालात में अहम सवाल यह है कि जब कंपनियों का परिचालन पेशेवर रूप से नहीं हो रहा है तो इनके शेयर कौन खरीदना चाहेगा।

पिछले सप्ताह राज्य सभा में एक सवाल के लिखित जवाब में वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि ओएनजीसी से 11,477 करोड़, कोल इंडिया से 15,740 करोड़ और एनएचपीसी से 1,976 करोड़ रुपये सरकार को विनिवेश के तहत जुटाने की उम्मीद है। खुदरा और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी अधिक से अधिक सुनिश्चित करने के लिए सरकार शेयर कीमतों में छूट दे सकती है।
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