देश में इस साल खाद्य तेलों का आयात बढ़ने की आशंका के बीच छोटे तिलहन उत्पादकों के हित सुरक्षित रखने के लिए सरकार से पाम ऑयल के आयात पर 10 फीसदी का शुल्क लगाने की मांग की गई है। तेल कारोबार पर नजर रखने वाले संगठनों का कहना है कि सस्ते भाव पर विदेशी बाजार से कच्चे पाम आयल की खरीद होने से देश के छोटे तिलहन उत्पादकों के हित बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।
इस स्थिति से बचने के लिए सरकार को गैर-रिफाइंड पाम ऑयल के आयात पर शुल्क लगाने के बारे में सोचना चाहिए। इस साल खराब मानसून के चलते तिलहन की बुआई काफी कम हुई है। इससे तिलहन की फसल कम होने और फिर खाद्य तेल उत्पादन पर भी विपरीत असर पडने की आशंका जतायी जा रही है।
पिछले वर्ष के 1.72 करोड टन की तुलना में इस बार 1.57 करोड टन तिलहन का ही उत्पादन होने का अनुमान है। कारोबारी संगठनों के मुताबिक घरेलू स्तर पर खाद्य तेल उत्पादन कम होने से इस साल विदेशों से कच्चे पाम तेल के आयात में खासा उछाल आने की उम्मीद है। एक अनुमान के अनुसार सत्र 2012-13 में पाम ऑयल का आयात चार फीसदी बढ़कर एक करोड़ टन पर पहुंच सकता है। गौरतलब है कि भारत पहले से ही खाद्य तेलों के आयात में पहले स्थान पर मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाम तेल के दामों में आई कमी भी इसके आयात में बढ़ोतरी की एक अहम वजह है। प्रमुख पाम उत्पादक देशों मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम ऑयल के भाव इस साल 21 फीसदी तक गिर चुके हैं। घरेलू उत्पादन गिरने और विदेशी बाजार में पाम आयल के भाव गिरने जैसे हालात के बीच सरकारी ट्रेडिंग कंपनी पीईसी ने 10 हजार टन पाम आयात का टेंडर जारी भी कर दिया है।
पीईसी ने मलेशिया अथवा इंडोनेशिया में उत्पादित तेल ही मंगाया है। इसके उलट कारोबारी जगत का एक वर्ग पाम आयात पर शुल्क लगाने से बचने की सलाह दे रहा है। इस वर्ग का कहना है कि सरकार को घरेलू तिलहन उत्पादन की हाल सुधारने के उपाय करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
तेल कारोबार से जुडे़ उद्योग संगठन सेंट्रल आर्गेनाइजेशन फार ऑयल इंडस्ट्री एंड ट्रेड के मुताबिक सोयाबीन का उत्पादन बीते वर्ष के 1.06 करोड़ टन की तुलना में बढ़कर 1.13 करोड टन रहने की संभावना है। देश में तिलहन की रोपाई जून और जुलाई के दौरान बरसात के मौसम में की जाती है और इसकी फसल अक्टूबर में कटने के लिए तैयार होती है। ऐसे में मानसून की वर्षा सामान्य से कम होने की स्थिति में तिलहन पैदावार पर असर पड़ता है।