साइप्रस के वित्तीय संकट का दबाव भारत सहित एशिया और यूरोप के शेयर और कमोडिटी बाजारों पर बढ़ता दिख रहा है। ग्लोबल बाजारों में इसके चलते भारी गिरावट नजर आ रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि साइप्रस के संकट का भारत पर भी असर पड़ेगा, क्योंकि साइप्रस के रास्ते भारत में काफी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आता है।
साइप्रस को यूरो जोन की ओर से दिए गए 10 अरब यूरो के बेलआउट पैकेज के बदले उसपर लगाए गए 9.9 फीसदी के तगड़े बेलआउट टैक्स के चलते साइप्रस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा जिससे वहां से आने वाले एफडीआई में कमी आने की संभावना है।
यूरोजोन द्वारा साइप्रस को दिए गए 10 अरब यूरो राहत पैकेज के लिए उसके सामने काफी कड़ी शर्तें रखी गई हैं। यूरोजोन के मुताबिक साइप्रस के जमाकर्ता भी मदद में शामिल होंगे।
पैकेज की शर्तों के मुताबिक 1 लाख यूरो से ज्यादा बचत वालों पर 9.9 फीसदी बेलआउट टैक्स लगाया जाएगा। वहीं, 1 लाख यूरो से कम सेविंग वालों पर 6.75 फीसदी का बेलआउट टैक्स लगेगा।
इस भारी-भरकम कर्ज की शर्त से साइप्रस में खलबली मच गई है और कर कटौती की आशंका से लोग बैंक खातों में जमा अपनी रकम को धड़ाधड़ निकाल रहे हैं।
भारी पैमाने पर अचानक शुरू हुई इस निकासी के चलते हालात ऐसे बने कि साइप्रस में बैंकों के एटीएम देखते ही देखते खाली हो गए और बैंकों के सामने नकदी का संकट खड़ा होने की स्थिति आ गई है। इसे देखते हुए साइप्रस सरकार ने मंगलवार को बैंकों को बंद रखने का फैसला किया है।
गौरतलब है कि यूरो जोन की ओर से दिए जा रहे राहत पैकेज से साइप्रस सरकार को 5.8 अरब यूरो मिलेंगे, पर इसकी कड़ी शर्तों के चलते उस पर भारी कर देयता भी आ बनेगी।
बेलआउट टैक्स को लेकर साइप्रस की संसद में सोमवार को वोटिंग होनी है। ग्लोबल अर्थव्यवस्था के जानकारों का कहना है कि साइप्रस के वित्तीय संकट का असर स्पेन और पुर्तगाल जैसे देशों पर भी हो सकता है।
यूरोजोन को लेकर चिंता बढ़ने से ग्लोबल बाजारों में शुरू हुई गिरावट जल्द ही 5 से10 फीसदी के स्तर तक पहुंच सकती है। हालांकि ग्लोबल फर्म मॉर्गन स्टैनली का कहना है कि साइप्रस संकट का असर दूसरे यूरोपीय देशों पर नहीं होगा।
इसके चलते तात्कालिक तौर पर बाजारों में थोड़ी गिरावट आ सकती है और यह गिरावट में निवेशकों के लिए खरीदारी का एक अच्छा मौका हो सकती है।