प्याज के दामों में तेजी और इसे लेकर बढ़ती सियासी बयानबाजी के बीच भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने समय-समय पर प्याज की कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ाए जाने की बात खुल कर कही है। सीआईआई की रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्याज के कारोबार में कीमतों को लेकर अस्पष्टता और जोड़तोड़ का आलम है और कारोबारी बाजार को अपने मन मुताबिक चलाते हैं।
सीआईआई ने बंगलौर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज से महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रमुख प्याज बाजारों में प्रतिस्पर्धा को लेकर एक अध्ययन कराया है, जिसकी रिपोर्ट आयोग को दिसंबर में सौंपी जा चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्याज बाजार के सीजनल सूचकांकों और मंडी में माल की दैनिक व मासिक आवक के साथ-साथ कीमतों में होने वाले बदलावों को देख कर पता चलता है कि प्याज बाजारों में कारोबार के अनुचित तौर तरीके अपनाए जाते हैं और कीमतों में जोड़-तोड़ (कर्टेलाइजेशन) किया जाता है। प्याज के कुछ बड़े कारोबारियों ने विभिन्न बाजारों में सक्रिय बिचौलियों और दलालों के साथ एक नेटवर्क बना रखा है। कारोबारियों ओर बिचौलियों का यह नेटवर्क ही आमतौर पर प्याज की कीमतें चढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाता है।
रिपोर्ट में कहा कि प्याज के कारोबार का नियंत्रण पूरी तरह से कारोबारियों के हाथों में है और किसानों की यहां जरा भी नहीं चलती। ज्यादातर प्याज किसानों की खेती एक से सवा एकड़ की जोतों में सिमटी होने के चलते कीमतों के निर्धारण में किसानों की कोई भूमिका नहीं रहती है। बाजार में अकसर जोड़तोड़ से ही प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव आता है, जबकि इसकी वजह फसल पर मौसम की मार और भाव से जुड़े कारोबारी जोखिम को बताया जाता है।
प्याज की ज्यादातर खरीद-फरोख्त ऐसे कमीशन एजेंटों व कारोबारियों द्वारा की जाती है जिनकी जोखिम उठाने की क्षमता, बाजार संबंधी जानकारी और अनुभव काफी कम होता है। किसानों को कारोबार से दूर ही रखा जाता है, जिसके चलते कीमतों के निर्धारण में उनका कोई प्रभाव नहीं रहता। इसके अलावा प्याज की ऊंची मार्केटिंग कॉस्ट, आधारभूत ढांचे की कमी और जमे-जमाए व्यापारियों द्वारा नए कारोबारियों को बाजार में उतरने न देने की प्रवृत्ति और समय-समय पर हड़तालों से कीमतें प्रभावित होती हैं।
रिपोर्ट में प्याज की कीमतों में हेराफेरी रोकने के कुछ उपाय भी सुझाए गए हैं। इसमें कृषि उत्पाद बाजार समिति (एपीएमसी) के सदस्यों और बाजार नियामक अधिकारियों की उपस्थिति में ही नीलामी कराने और कारोबारियों व नियामक निकायों के बीच टकराव का महौल खत्म करने जैसी सलाहें शामिल हैं। इसके अलावा प्याज की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए को-आपॅरेटिव मार्केटिंग सोसाइटियों को बढ़ावा देने का भी सुझाव दिया गया है।