नए मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन का मानना है कि आवश्यकता से अधिक नियमन और कोयला एवं बिजली की कमी के चलते भारत में निजी निवेश कमजोर पड़ा है।
देश में ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए इन बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। सुब्रमण्यन ने एक पॉडकास्ट साक्षात्कार में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर गवर्नेंस, प्रोजेक्ट्स को मजबूत सरकारी संरक्षण, अच्छी बुनियादी सुविधाएं जैसे बड़े सुधारों की आवश्यकता है।
अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका सुनिश्चित करने का मतलब जरूरत से अधिक नियमनों, जिसके चलते निजी निवेशक दूरी बनाए हुए हैं, को हटाना है। यह वैसी दोहरी चुनौतियां हैं, जिनसे भारत जूझ रहा है। सुब्रमण्यन आईएमएफ के पूर्व अर्थशास्त्री हैं। गत 16 अक्तूबर को उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया।
एक सवाल के जवाब में सुब्रमण्यन ने कहा कि बिजली की कमी, पर्याप्त कोयला न होने या कंपनियों पर भारी कर्जे के चलते कई बड़े प्रोजेक्ट ठप पड़े हैं। इसलिए इन बाधाओं को दूर कर निजी निवेश और ग्रोथ को तेज रफ्तार दे सकते हैं। नौकरशाह कोर्ट में घसीटे जाने के डर से अहम फैसले नहीं ले रहे हैं।
इसलिए मेरा मानना है कि तेजी से फैसले लेने वाला माहौल तैयार करना होगा। उसके बाद बुनियादी सुविधाएं बेहतर करनी की जरूरत है। कोयला और बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करना और अन्य बाधाओं को दूर करना बड़ी प्राथमिकता होगी।
उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास और मांग के अनुरूप रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में पांच फीसदी की विकास दर भारत के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि भारत को सही मायने में इन चुनौतियों को दूर करना है तो उसे करीब 10, 15, 20 सालों के लिए विकास दर को निरंतर 7.5 और 8 फीसदी पर वापस लाना होगा।
सुब्रमण्यन ने कहा कि नई सरकार के आने के बाद से यह उम्मीद जगी है कि वह इन समस्याओं का समाधान कर सकती है। इस तरह एक सकारात्मक माहौल बना है। शेयर बाजारों में तगड़ा उछाल है, विदेशी पूंजी का प्रवाह तेज हुआ है और जो शुरुआती कदम उठाए गए हैं उनसे साफ लगता है कि माहौल बेहतर हुआ है।
लेकिन, यह महज शुरुआत है। अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी सरकार बेहतर प्रशासन और निजी निवेश आकर्षित करने के गुजरात मॉडल को पूरे देश में लागू करने का प्रयास कर रही है।