भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) ने उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को खारिज करते हुए लागत के आधार पर उचित व लाभकारी मूल्य दिए जाने की मांग की है। गेहूं के मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य को किसान के लिए घाटे का सौदा करार देते हुए भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने आगामी 18 मार्च को जंतर-मंतर पर किसान महापंचायत बुलाने का ऐलान किया है। महापंचायत में इस मुद्दे पर आंदोलन की रूपरेखा तय की जाएगी।
टिकैत ने गन्ना किसानों की स्थिति को भी चिंताजनक बताते हुए कहा है कि कई चीनी मिलें सरकार द्वारा तय दाम पर गन्ने की खरीद नहीं कर रही हैं। किसान औने-पौने दाम पर गन्ना बेचने को मजबूर है। भाकियू ने रॉ शुगर के आयात को बंद करने और इसका आयात शुल्क 10 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी करने की मांग भी की है।
गेहूं के दाम तय करने में केंद्रीय कृषि एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के रवैये की आलोचना करते हुए भाकियू के राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह ने कहा है जिस आयोग ने पिछले साल गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,400 रुपये कुंतल तय करने की सिफारिश की थी, उस आयोग ने 2013-14 के रबी सीजन में गेहूं का मूल्य न बढ़ाने की सिफारिश की है। जबकि एक साल में डीजल, मजदूरी, खाद, बीज जैसी चीजें महंगी हो गई हैं।
सीएसीपी की भूमिका को किसान विरोधी करार देते हुए भाकियू ने हरेक उपज की लागत के ऊपर 50 फीसदी मूल्य दिए जाने की मांग की है। भाकियू इस मुद्दे पर बड़े आंदोलन की तैयारी कर रही है, जिसके लिए आगामी 18 मार्च को जंतर-मंतर पर महापंचायत बुलाई गई है। राकेश टिकैत का कहना है कि उत्तर भारत के अलावा मध्य और दक्षिण भारत के किसानों को भी लामबंद किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि पिछले साल केंद्र सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,285 रुपये प्रति कुंतल तय किया था, जिसमें इस साल सिर्फ 65 रुपये की बढ़ोतरी करते हुए इसे 1,350 रुपये किया गया है। भाकियू के पंजाब अध्यक्ष अजमेर सिंह लाखोवाल का दावा है कि पंजाब में एक कुंतल गेहूं की लागत करीब 1,500 रुपये आ रही है, इसलिए 2 हजार रुपये कुंतल से कम दाम किसानों के लिए घाटे का सौदा है।