यूपीए सरकार की गांव-गांव में बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने की कवायद अब फेल होती नजर आ रही है।
इसकी वजह यह है कि बैंकों को ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने के लिए न तो एजेंट मिल रहे हैं और न ही बिजनेस कॉरस्पाडेंट मॉडल के तहत कारोबार के लिए कंपनियां सामने आ रही हैं।
ऐसे में ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सेवाओं के विस्तार में आ रही इस बाधा का असर लोगों के खाते में नकद सब्सिडी पहुंचाने की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना पर भी पड़ना तय दिख रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार देश में मार्च 2013 तक 2,21,341 बिजनेस कॉरस्पॉडेंट (बैंकिंग आउटलेट) जुड़े हैं।
इनके जरिए कुल खोले गए 18.2 करोड़ साधारण बचत खातों में से 50 फीसदी से ज्यादा में अब तक कोई लेन-देन (ट्रांजेक्शन) नहीं हुआ है।
रिजर्व बैंक ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि खातों में लेन-देन न होने की वजह से बिजनेस कॉरस्पॉडेंट मॉडल की उपयोगिता पर खतरा खड़ा हो सकता है।
बैंकर्स के अनुसार साल 2011 के बाद से वित्तीय समावेशन के लिए बदली गई रणनीति की वजह से बिजनेस कॉरस्पॉडेंट मॉडल पर प्रतिकूल असर हुआ है।
उनके अनुसार पहले बैंक केवल अपने स्तर पर शाखा के जरिए बिजनेस कॉरस्पॉडेंट को जोड़ते थे, पर नए मॉडल में कंपनियों को शामिल किया गया।
साथ ही जीरो बैलेंस वाले खातों को सभी बैंकों से लिंक करने की कवायद शुरू की गई।
एक सार्वजनिक बैंक के सेवानिवृत्त कार्यकारी निदेशक के अनुसार नए मॉडल को लागू करने के लिए उच्च तकनीक की जरूरत है। इसके लिए पूंजी की भी जरूरत है।
देश में 20 क्लस्टर के जरिए कंपनियों को जो काम मिला, वह पूंजी नहीं जुटा पाईं, जिसकी वजह से अब मुश्किल से एक-दो कंपनियां ही सही ढंग से काम कर पा रही हैं।
बिजनेस कॉरस्पॉडेंट के रूप में काम कर रही कंपनी सीड फाइनेंशियल सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर अनिरबन रॉय के अनुसार सरकारी बैंकों को अपने सोच में बदलाव की जरूरत है।
जब तक वह बिजनेस कॉरस्पॉडेंट मॉडल को लाभकारी बनाने के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक इसका सफल होना मुश्किल है। सरकार को नंदन नीलेकणी की सिफारिशों को लागू करना चाहिए।
एक अन्य सार्वजनिक बैंक के अधिकारी के अनुसार अभी बैंक सीधे तौर पर एजेंट को 2,500 रुपए प्रतिमाह का वेतन देते हैं। इसके बाद प्रति लेनदेन पर कमीशन देते हैं।
जीरो बैंलेंस खाते तो खुल तो गए हैं, पर लेन-देन उनमें न के बराबर हैं। ऐसे में एजेंट्स की बहुत कम कमाई हो पाती है।
इस वजह से वह बैंकों के साथ नहीं जुड़ रहे हैं। साथ ही जो हैं, वह नौकरी छोड़ रहे हैं।
एक अन्य बैंकर के अनुसार बिजनेस कॉरस्पॉडेंट के लिए कंपनियों का चयन सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी को आवंटन करके हुआ था।
इसके तहत प्रति 100 रुपए के लेन-देन पर 11-19 पैसे की न्यूनतम बोली लगी, जबकि कंपनियों के अनुसार साल 2012 में की गई टेंडर प्रक्रिया में यह राशि 50 पैसे से कम नहीं होनी चाहिए थी।
ऐसे में कंपनियां लाइसेंस पाने के बाद भी काम को शुरू नहीं कर पाईं।