देश के प्रमुख बैंक छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए आरबीआई द्वारा तय मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे है। जिसे देखते हुए सूक्ष्म,लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक को पत्र लिखा है। साथ ही यह भी कहा है कि ऐसे कदम उठाए जाए जिससे कि बैंक तय मानकों को पूरा कर सकें।
इस मामले में बैंक भी आरबीआई से कह चुके हैं कि सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की परिभाषा में बदलाव किया जाय। जिससे कि माइक्रो सेक्टर के कारोबारी उन्हें मिल सकें। बैंकों के अनुसार माइक्रो सेक्टर के उपयुक्त कारोबारी न मिलने से लक्ष्य पूरा करने में दिक्कत आ रही है।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि आरबीआई के साथ हुई बैठक में यह बात मंत्रालय ने रखी है। आरबीआई के नियम के मुताबिक बैंकों को हर साल माइक्रो सेक्टर के कारोबारियों की संख्या में कर्ज देने के लिए 10 फीसदी की दर से बढ़ोतरी करनी है। यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। जबिक छोटे और मझोले सेक्टर के 90 फीसदी से ज्यादा कारोबारी माइक्रो सेक्टर के तहत आते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार माइक्रो एंड स्मॉल वर्ग के तहत 19 अक्टूबर 2012 तक 2,595 अरब रुपये तक कर्ज बैंकों ने दिया है। जबकि अक्टूबर 2011 में 2,438 अरब रुपये कर्ज दिया गया था। रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2010 से अक्टूबर 2011 तक इस वर्ग को मिले कर्ज में केवल 6.4 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई थी। जो कि मार्च 2012 से अक्टूबर 2012 की अवधि में केवल 0.4 फीसदी की दर से ही बढ़ी है।
कर्ज की रफ्तार में आई गिरावट पर बैंकों का कहना है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के तहत 25 लाख रुपये तक प्लांट और मशीनरी निवेश और सर्विस सेक्टर के 10 लाख रुपये तक के निवेश वाले कारोबारी माइक्रो सेक्टर में आते हैं। निवेश की सीमा कम होने की वजह से उपयुक्त कारोबारी मिलने में दिक्कत आ रही है। ऐसे में आरबीआई को निवेश सीमा में बढ़ोतरी करनी चाहिए। जिससे कि माइक्रो सेक्टर के तहत ज्यादा से ज्यादा कारोबारी आ सके।