देवदासी यानी मंदिर में भगवान को समर्पित दासी। भारत में पुरातन काल में देवदासी की प्रथा थी। इस प्रथा के बारे में लोग बहुत कम जानते है। आखिर क्यों बनाई जाती थी औरतें देवदासी। क्या थी उनकी दिनचर्या और क्या थे उनके नियम कायदे। ये जानना बड़ा ही दिलचस्प रहेगा।
भविष्य और मत्स्य पुराणों के अनुसार ‘कोई भी व्यक्ति जो अपनी कन्या को मंदिर में दान करेगा, वह विष्णु लोक में पहुंचेगा’। इस धार्मिक मान्यता का निर्वहन करते हुए भारत के अन्य क्षेत्रों की तरह देवभूमि हिमाचल में भी देवदासी प्रथा शुरू हो गई। लोग स्वर्ग की प्राप्ति हेतु अपनी किशोर लड़कियों को मंदिर में दान कर दिया करते थे। मंदिर की संपत्ति बन जाने के बाद युवती का जीवन मंदिर के लिए हो जाता था। मंदिर में देव पूजन के साथ साथ वो नृत्य, भजन इत्यादि किया करती थी।
लेकिन इसके कई बुरे पहलू भी सामाजिक मान्यता बनते गए। मसलन देवदासियां मदिर के पंडों की संपत्ति बन गई। पंडे देवदासियों का शारीरिक शोषण किया करते थे और इसी कारण देवदासियों को 'वेश्या' तक कहा जाने लगे। मंदिर और देवता के नाम पर देवदासियों का हर तरह से शोषण होने लगा। कई दशकों तक शोषण के बाद समाज सुधारकों ने देवदासी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और ये प्रथा समाप्त हो पाई।
देवदासी की पौराणिक विचारधारा का 700 से 1200 ई के बीच काफी विस्तार हुआ। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पहली बार 'देवदासी' शब्द मिला। राजतरंगणि, कुट्टनीमत्तम और कथासरितसागर साहित्यिक रचनाओं में भी देवदासी शब्द का प्रयोग हुआ है। दक्षिण भारत में तमिल में देवदासी को ‘देवरतियाल’, मल्यालम में ‘तेवादिची’ और कर्नाटक में ‘वासवी एवं वेश्या’ कहते हैं। उत्तरी भारत में इसे देवदासी कहा जाता है।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिसा के मंदिरों में अभी भी देवदासी की प्रथा प्रचलित है। कर्नाटक के अधिकतर शैव मंदिरों में सुबह स्वस्ति मंत्रों के उच्चारण के समय, रथयात्रा, रंगभोग और अंगभोग में देवता के समक्ष देवदासी की उपस्थिति अनिवार्य होती थी। मत्स्य पुराण के अध्याय 70 में 41-63 श्लोक में कहा गया है कि देवदासियों को संतान होना कोई पाप नहीं है। 2005 की रिपोर्ट के अनुसार जगन्नाथपुरी में नृत्य करने के लिए देवदासी को 30 रुपये मिलते थे।