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'इलाहाबाद से होकर कभी नहीं बहती थी सरस्वती'

Fri, 25 Jan 2013 11:16 AM IST
अखिलेश मिश्र/इलाहाबाद
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महाकुंभ में पूरी दुनिया से पहुंचे श्रद्धालु वैज्ञानिकों के इस दावे से आप अचंभित हो सकते हैं। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करने वालों को यह सुनकर थोड़ा झटका लग सकता है कि प्रयाग में सरस्वती कभी बहती ही नहीं थी। यह दावा किसी इतिहासकार का नहीं बल्कि इसरो के वैज्ञानिकों का है।
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वैज्ञानिकों ने यह दावा कागजी तथ्यों के आधार पर नहीं किया है, बल्कि उपग्रहीय सर्वेक्षण के बाद यह तथ्य प्रस्तुत किया है कि सरस्वती प्रयाग में कभी नहीं बहती थी। इस पौराणिक नदी के निशान राजस्थान में मिलते हैं।

हिमालय में मौजूद है सरस्वती का मूल
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के वैज्ञानिक डॉ. एके गुप्ता ने उपग्रहीय अध्ययन के बाद दावा किया कि पौराणिक सरस्वती का मूल हिमालय में आज भी मौजूद है। उपग्रह से लिए गए चित्रों के माध्यम से इसरो वैज्ञानिक ने स्पष्ट किया कि आज भी इस विलुप्त नदी के पैलियो चैनल राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर जिले सहित कुछ दुर्गम स्थानों में मौजूद हैं।
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सरस्वती का अस्तित्व
इलाहाबाद संग्रहालय में बृहस्पतिवार को आयोजित संवाद में विलुप्त सरस्वती के उपग्रह से लिए चित्रों के आधार पर इसरो वैज्ञानिक ने बताया कि धरती के स्वरूप में आए बदलाव के बाद यह नदी अपना अस्तित्व खो बैठी। उन्होंने जीआईएस और पुरातात्विक सर्वे के आधार पर प्रचलित सभी भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश की। साथ ही स्पष्ट किया कि सरस्वती, सतलज और यमुना के बीच की नदी थी। इन दोनों नदियों के जल के कारण ही सरस्वती नदी का अस्तित्व था।

कालांतर में हुए भौगोलिक परिवर्तन के कारण सतजल, सिन्धु नदी की सहायक बन गई और यमुना, गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदी के रूप में सामने आई। भौगोलिक बदलाव के कारण इन नदियों के स्वरूप में परिवर्तन हुआ और सरस्वती नदी सूख गई। जिस स्थान पर यह नदी थी, उसका अस्तित्व आज भी है। नदी की जगह पर आज भी मीठे जल के पैनल मौजूद हैं।

सरस्वती ही सिंधु!
वैज्ञानिक डॉ. गुप्ता के मुताबिक कुछ इतिहासकार सरस्वती को ही सिन्धु मानते हैं। पाकिस्तान में इस नदी को हाकरा नाम से जानते हैं। जीआईएस सर्वे के आधार पर डॉ. गुप्ता का कहना है कि पोंटा साहिब के पास सरस्वती का अस्तित्व खत्म हो गया। उन्होंने दावा किया कि सरस्वती की धारा वहीं पर यमुना से मिलती दिखती है।

संतों की वाणी ही सरस्वती
अदृश्य सरस्वती को लेकर पहले भी जब सवाल उठे हैं तो विद्वानों ने राय दी कि प्रयाग का सांस्कृतिक रूप, संतों की वाणी ही सरस्वती है। अब इसरो के वैज्ञानिक के दावे ने इस मत को और पुष्ट कर दिया है। महाकुंभ में जुटे संत, महामंडलेश्वर भी यह कहते रहे हैं कि गंगा-यमुना के संगम के साथ यहां महीने भर संतों के मुंह से निकलने वाली अमृत वाणी ही सरस्वती है। इन तीनों के संगम को ही त्रिवेणी कहा जाता है।

इस संवाद में मौजूद संग्रहालय के अध्यक्ष राजेश पुरोहित एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बीडी मिश्र ने सरस्वती की ऐतिहासिकता के बारे में डॉ. एके गुप्ता के दावे का समर्थन किया।
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