जब ते बरसाना ए आधुनिकता कौ रंग चढ़ौ, नक्कारौ(नगाड़ा) खामोश है गयौ। चौपई मंडली के निरंजन ने पुरानी बातें याद कर बड़े ही निराशा भाव से यह कहा। उन्होंने कहा की बरसाने की होली में अब वह बात नहीं रही।
निरंजन ने कहा कि यह हमारा ब्रज ही है जहां चौपई गाई नहीं जाती बल्कि चलती और जमती है। कभी बरसाने की गलियों में चौपई का डंका बजता था। रंगीली(होली) के दिनों में लोग कई समूहों में अपने नक्कारै बजाते और गाते बाजार में निकलते थे पर वक्त के साथ यह परंपरा धूमिल हो गई।
आधुनिकता के रंग के साथ नक्कारै खामोश हो गए हैं। अब तो एक दो सूमहों में ही चौपई निकालती हैं। यादव मोहल्ला आज अपनी प्राचीन परंपरा को निभा रहे हैं पर पहले जैसा मजा नहीं आता। चौपाल में रखे नक्कारे से तो अभी तक धूल भी नहीं झड़ी है।
निरंजन ने बताया कि यह नक्कारे बहुत पुराने हैं। इन्हें बजाने के लिए दो तीन आदमियों की जरूरत होती है। इन्हें चार पहियों वाली गाड़ी में रखकर हाथों से खींच कर आयोजन वाली जगह ले जाया जाएगा और लठामार होली के दिन लोग चौपई निकालेंगे।
होली के रसिया गाए जाएगें। यहां से सुदामा चौक तक चौपई चलेगी। उन्होंने बताया कि अब पहले की तरह रौनक नहीं है। पहले 7-8 चौपई निकला करती थीं। आसपास के गांव वाले अपने नक्कारे लेकर बरसाने आ जाते थे। अब तो बस यादव ही लकीर पीट रहे हैं।
वृषभानु मंदिर का नक्कारा भी दो साल से खामोश है। इस नक्कारे से बाग मोहल्ला के ठाकुरों की चौपई निकला करती थी। ठाकुरों में भी कई सालों से चौपई की गूंज खत्म हो गई है।
यहां के तारा सिंह ने बताया कि नगाड़ा फट गया था तो बेच दिया। इस बार सब लोग नया नगाड़ा लाने की सोच रहे थे लेकिन लड़ाई झगड़े के कारण नहीं लाए। चौपई में हुड़दंग होने लगा था इसलिए वह बंद कर दी। अब वैसे होली गाने वाले वाले नहीं रहे। श्री जी मंदिर के सेवाधिकारी सत्यनारायण गोस्वामी ने बताया कि ये नक्कारे करीब 100 साल पुराने हैं।