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महाकुंभ में बेड़ियां और फांसी का फंदा भी

Sun, 20 Jan 2013 04:04 PM IST
अमित सरन/इलाहाबाद
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को किस तरह की बेड़ियां पहनाई जाती थीं। बेड़ियों का इतिहास क्या रहा है। इलाहाबाद नैनी सेंट्रल जेल में आखिरी बार किन दो भाइयों को फांसी दी गई। फांसी कैसे दी जाती है। यह सब देखना या जानना है तो कुंभ नगरी में आयोजित कारागार प्रशासन की प्रदर्शनी में पहुंचे। जहां 50 किलो से ज्यादा वजन वाली बेड़ियां भी दिख जाएंगी, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पहनाई जाती थीं और फांसी का वह फंदा भी देखने को मिलेगा, जिस पर नैनी सेंट्रल जेल में अंतिम कैदी को लटकाया गया।
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कारागार प्रशासन की यह प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। प्रदर्शनी के इंचार्ज और नैनी सेंट्रल जेल में वर्ष 1984 से दरी इंस्ट्रक्टर के पद पर तैनात दिनेश शर्मा ने बेड़ियों और फांसी के फंदे के पीछे छिपी जो कहानी बताई, वह आम लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

कौन पहनता था 50 किलो की बेड़ी
हाथ से 30 बीस किलो का बोझ उठाना पड़े तो ठीक से चलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पैर पर 50 किलो से ज्यादा बोझ बांध दिया जाए तो पैदल चलने की कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं लेकिन देश को आजादी दिलाने वालों को इस यातना से भी होकर गुजरना पड़ा। प्रदर्शनी में ये बेड़ियां रखी गई हैं, जो लखनऊ जेल से मंगाई गई हैं। इन पर लिखा है, ‘स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजों द्वारा प्रयोग में की गई बेड़ियां।’ यह बेड़ियां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के पैरों पर बांधी जाती थीं।
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अंग्रेजों के जाते ही हल्की हो गईं बेड़ियां
आजादी से पहले बड़ी बेड़ियां कैदियों को सिर्फ बांधने नहीं, उन्हें यातना देने का भी एक जरिया थीं लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद बेड़ियों का वजन काफी कम कर दिया गया। बेड़ियां लगाने का उद्देश्य सिर्फ इतना रह गया कि कोई कैदी भाग न सके। धीमे-धीमे बेड़ियों का वजन और कम दिया गया। और अंत में बेड़ियों का वजन तीन से चार किलो के बीच सीमित रह गया। बाद में कैदियों को बेड़ियां पहनाने की प्रथा ही खत्म कर दी गई। प्रदर्शनी में वह बेड़ी भी रखी गई है, जो अंतिम रूप से कैदियों को पहनाई गई।

रोंगटे खड़े कर देती है फंदे की कहानी
प्रदर्शनी में एक घड़ा रखा है और उस घड़े में रस्सी का बना एक मोटा फंदा है। घड़ा कपड़े से ढका हुआ है। घड़े में रखे फंदे की कहानी सामने आते ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बकौल प्रदर्शनी इंचार्ज दिनेश शर्मा के अनुसार यह वही फंदा है, जिस पर नैनी सेंट्रल जेल में वर्ष 1989 में अंतिम बार कैदी को फांसी पर लटकाया गया। इसके साथ दो फंदे और हैं, जो जेल में रखे हुए हैं। दअरसल, फांसी तीन कैदियों को दी गई थी। इनमें दो सगे भाइयों को नैनी सेंट्रल जेल में एक ही दिन और एक ही वक्त फांसी दी गई।

हत्या के जुर्म पहले दोनों भाइयों को उम्र कैद और उनके दो बेटों को मियादी सजा मिली थी। बाद में ऊंची अदालत में मामला पहुंचने पर भाइयों ने एक-दूसरे के खिलाफ गवाही दे दी और उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई जबकि बेटों की मियादी सजा उम्रकैद में बदल गई। जिन फंदों पर उन्हें लटकाया गया, उन्हीं में से एक फंदा प्रदर्शनी में रखा हुआ है। 1989 में नैनी जेल में जिन तीन कैदियों को अंतिम बार फांसी दी गई, उनमें श्रीकृष्ण पुत्र छेदालाल, बाबूलाल पुत्र बंसू और अशर्फी पुत्र बंसू के नाम शामिल हैं।

सबकी आंखों के सामने लग रही फांसी
फांसी कैसे दी जाती है, यह दिखाने और बताने के लिए प्रदर्शनी में फांसी घर का एक मॉडल भी रखा गया है। मॉडल में एक पुतले के गले पर फंदा लगा हुआ है। दरवाजानुमा वह जगह भी बनी हुई है, जहां गले पर फंदा कसने के बाद कैदी को खड़ा करते हैं। इस दरवाजे को खोलने लिए किनारे पर एक हैंडिल लगा हुआ है, जिसे जल्लाद खींचता है। प्रदर्शनी में मॉडल के जरिये फांसी देने की पूरी प्रक्रिया दिखाई जा रही है।
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