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बिहार चुनाव 2025: जब जेपी ने ललकारा भूमिहार राज...नेहरू के फैसले से बची श्रीकृष्ण की कुर्सी

सार

1957 में सीएम पद की लड़ाई के बाद जब अनुग्रह मिलने पहुंचे, तो घर की पहली मंजिल पर खड़े श्रीकृष्ण भागते हुए सीढ़ियों से आए और उनके गले लग गए। भावनात्मक मेल से दोनों के बीच अदावत खत्म हुई। अमर उजाला की खास श्रृंखला- मगधराज की दूसरी कड़ी में जानिए राज्य की सियासत से जुड़े किस्से
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श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वर्ष 1947। भारत आजाद हो चुका था। 1950 में संविधान बना और 1952 में बिहार समेत पूरे देश में विधिवत चुनावी प्रक्रिया का आगाज हुआ। बिहार में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली और मुख्यमंत्री पद की रेस में फिर वही दो चेहरे आमने-सामने थे- श्रीकृष्ण सिंह और  अनुग्रह नारायण सिंह।

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नेहरू का फॉर्मूला : दोस्ती व गोलबंदी
इस बार स्थिति 1937 जैसी नहीं थी, लेकिन अंदरखाने खींचतान जारी थी। बताते हैं कि तब राष्ट्रपति बन चुके डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अनुग्रह नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पसंद श्रीकृष्ण सिंह थे। नेहरू ने हस्तक्षेप किया और एक ऐसा रास्ता निकाला कि विधायक दल की बैठक में अनुग्रह नारायण सिंह ने ही श्रीकृष्ण सिंह का नाम आगे किया। फॉर्मूले के तहत, श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बने और अनुग्रह नारायण सिंह उपमुख्यमंत्री। कहने को दोनों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी, लेकिन दोस्ती भी कायम थी। मंत्रिमंडल में दोनों ने एक-दूसरे की पसंद का ख्याल रखा।

 1957 : अदावत-सियासत-दोस्ती
 1957 के दूसरे विधानसभा चुनाव से पहले समर्थकों ने दोनों नेताओं के बीच ऐसी खाई पैदा की, जो फिर कभी भर नहीं सकी। चुनाव जीतने के बाद अनुग्रह नारायण सिंह ने खुलकर मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोक दिया, यह सोचकर कि दिल्ली से अब पहले जैसा दबाव नहीं है। लेकिन श्रीकृष्ण सिंह ने गुटबाजी को भांपते हुए बड़ा दांव चला। उन्होंने ऑब्जर्वर बनकर आए मोरारजी देसाई के जरिए अनुग्रह गुट के संभावित उम्मीदवारों की लिस्ट से कई नाम कटवा दिए। अंततः  श्रीकृष्ण सिंह फिर से अनुग्रह नारायण सिंह पर भारी पड़े और मुख्यमंत्री बने।
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जेपी का विस्फोटक पत्र : बिहार को भूमिहार राज में बदल दिया
भूमिहार बनाम क्षत्रिय की सियासी अदावत के साथ ही कायस्थ बनाम भूमिहार की सियासी लड़ाई भी चरम पर थी। 1957 में चुनाव के कुछ समय बाद अनुग्रह का निधन हो गया। सीएम श्रीकृष्ण के दो करीबी केबी सहाय (कायस्थ) व महेश प्रसाद सिन्हा (भूमिहार) चुनाव हार गए थे। श्रीकृष्ण ने सिन्हा को खादी बोर्ड का चेयरमैन बना दिया, लेकिन सहाय के हाथ कुछ नहीं लगा। तब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने श्रीकृष्ण को एक पत्र लिखा, जो जातिवादी राजनीति पर तीखा प्रहार था।

जयप्रकाश ने लिखा- कोई भी इस बात से इंकार करेगा कि आपमें या अनुग्रह बाबू में जातिवादी सोच है। बावजूद इसके, आपकी सरकार को भूमिहार राज और अनुग्रह बाबू को राजपूतों के नेता के तौर पर देखा जाता है। विषैली अमरलता की तरह जातिवाद ने बिहार को जकड़ लिया है। आप ही इसे उखाड़ कर फेंक सकते हैं...यदि आप जातिवाद की जड़ काटना चाहते हैं, तो निर्णय लेना होगा कि आपके बाद आपकी जाति का कोई सीएम नहीं बन सके।

श्रीकृष्ण सिंह का पलटवार : आप कायस्थ गुट के कदम पर चल रहे
श्रीकृष्ण सिंह ने पलटवार करते हुए जेपी पर कदमकुंआ ब्रेन ट्रस्ट यानी कायस्थ गुट से प्रभावित होने का आरोप लगाया। श्रीकृष्ण सिंह ने बिना देर लगाए जेपी के सवाल के जवाब में लिखा, आपने जो लिखा है, उससे पता चलता है कि राज्य की स्थिति का आकलन करते हुए आप भी शक-संदेह से भरे वातावरण से मुक्त नहीं हो सके। आपने बाजारू कानाफूसी को तरजीह दी...सुविधानुसार कुछ बातों पर विश्वास किया और कुछ पर अविश्वास...आजकल यह प्रचलन बन चुका है कि जो व्यक्ति जातिवाद से जितना अधिक ग्रस्त होता है, उतना ही अधिक वह दूसरों की निंदा करता है। भूमिहार राज का नाम भी इन्हीं लोगों के द्वारा दिया गया है, जो पूरी तरह से जातिवाद में डूबे हुए हैं।

आजादी के बाद भी सीएम की कुर्सी को लेकर सवर्णों के बीच चली यह जंग साफ बताती है कि बिहार में जातीय राजनीति का उद्गम लालू या नीतीश के दौर में नहीं हुआ। यह विमर्श हमेशा से मौजूद रहा है, जिसने अगड़े बनाम पिछड़े, पिछड़े बनाम अति पिछड़े जैसे कई नए मोड़ लिए।

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