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यहां मुसलमान नहीं चाहिये, केवल वेद ही चलेंगे, अगर ये बातें हुई तब हिंदुत्व नहीं रहेगा: भागवत

Tue, 18 Sep 2018 09:56 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, दिल्ली
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उन लोगों को करारा जवाब दिया है, जो आरएसएस को केवल हिंदू धर्म का संगठन बताकर उसकी आलोचना करते हैं। मंगलवार को विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण, व्याख्यानमाला के दूसरे दिन बोलते हुए उन्होंने कहा, हिंदू राष्ट्र में जब यह कहा जाने लगेगा कि यहां मुसलमान नहीं चाहिए, केवल वेद ही चलेंगे तो यह हिंदुत्व नहीं रहेगा। हिंदुत्व का मतलब जोड़ना है, सबको साथ लेकर चलना है। हमारी संकल्पना ही यही है कि हम अपने मन में सबके कल्याण की भावना रखते हैं।

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संविधान की भावना का पूर्ण पालन करता है संघ, अंग्रेजी में पढ़ी प्रस्तावना...

कई राजनीतिक दलों द्वारा यह कहा जाना कि आरएसएस देश के संविधान में विश्वास नहीं रखता, वह उसे नहीं मानता, इस बाबत मोहन भागवत ने दो टूक शब्दों में कहा कि यह पूरी तरह से गलत है। अपना संविधान है, उसे अपने लोगों ने बनाया है। भागवत ने लोगों को संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाई। हालांकि उन्होंने इसे अंग्रेजी में पढ़ा। सरसंघचालक ने कहा, संविधान में लिखी एक-एक बात का आरएसएस सम्मान करता है और दृढ़ता से पालन करता है। संविधान के साथ सब बंधे हैं, इसके अपमान का तो सवाल ही नहीं उठता। कोई एक उदाहरण ऐसा बता दें, जिससे यह साबित होता हो कि आरएसएस ने कभी संविधान का अपमान किया हो।

...लेकिन सामर्थ्य नहीं है तो दुनिया सुनती भी नहीं है

सरसंघचालक ने कहा, सामर्थ्य होना अच्छी बात है। प्रत्येक भारतीय की कामना है कि हमारा देश सामर्थ्य सम्पन्न बने। यहां ध्यान देना जरूरी है कि सामर्थ्य होने का मतलब दूसरों को दबाना नहीं है। हालांकि भागवत ने साथ ही यह भी कहा, आज के समय में बिना सामर्थ्य के दुनिया सुनती भी नहीं है। संघ चाहता है कि भारत सबका नेतृत्व करे, लेकिन इस भावना के पीछे अहंकार नहीं है। अगर हम सामर्थ्य संपन्न बनते हैं तो दूसरे देशों को भी आगे ले जाएंगे। तरक्की कभी भी एक सोच या अवधारणा पर नहीं चलती। उन्होंने जापान की एक पुस्तक ‘द इन्क्रेडीबल जापान’ का जिक्र किया। इसके अंतिम पन्ने पर नौ निष्कर्ष लिखे थे।खास बात है कि पहले पांच निष्कर्षों में तो अर्थव्यवस्था से जुड़ी किसी बात का जिक्र तक नहीं था। पहले नंबर पर लिखा था, अनुशासित विकास हो, दूसरा, अकेले हित का विचार कभी मत लाओ, तीसरा अपने देश के लिए कोई भी साहस अपनाओ, चौथा त्याग करने के लिए सदैव तैयार रहो और पांचवां निष्कर्ष था कि काम उत्कृष्ट हो, यह चिंता होनी चाहिये। 
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डंडे से काम नहीं चलेगा, सबको साथ लेना ही होगा...

अगर आगे बढ़ना है तो आर्थिक, सामरिक और राजनीतिक सामर्थ्य होना जरूरी है। सबको मित्र बनाकर आगे बढ़ो। इस बात को आगे बढ़ाते हुए भागवत ने कहा, हमारा विजन डॉक्यूमेंट यह है कि हम पिछड़े देशों को बराबर लाएं। हमारा मकसद किसी को दबाने का नहीं है। ये सदैव ध्यान रखें कि डंडे से काम नहीं चलेगा। अच्छे कार्यों से ही सम्मान पैदा होता है। हालांकि आजकल कोई अच्छा काम करता है तो उस पर भी लोग शंका करने लगते हैं कि वे अच्छा काम क्यों कर रहे हैं, इनके पीछे कोई स्वार्थ आदि तो नहीं है। खैर, वे सोचते रहेंगे, हमें अपना काम करना है। हम यह भी नहीं चाहते कि वे लोग खत्म हो जाएं। बस इतना चाहते हैं कि उन लोगों का यह जो टेढ़ापन है, वह चला जाए।
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