मौका भांपना और वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप कारगर दांव लगाना, सिविल इंजीनियरिंग के छात्र से राजनेता बने नीतीश कुमार का चार दशक लंबा राजनीतिक कॅरियर इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है। बार-बार पाला बदलने के कारण विरोधियों ने उन्हें कुर्सी कुमार और पलटू राम का नाम दिया। उनकी तुलना मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले दिवंगत नेता रामविलास पासवान से भी की गई।
नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग ने बिहार को लालू-राबड़ी के मोहपाश से बाहर निकाला। उन्होंने महादलित और गैरयादव पिछड़ा कार्ड के जरिए बिहार में नई सोशल इंजीनियरिंग की नींव रख कर राजद के एमवाई समीकरण तो लोजपा के दलित कार्ड को पस्त किया।
नीतीश का हर मौके पर नया दांव
पहला दांव : लालू प्रसाद पर
नीतीश 1985 में नालंदा की हरनौत सीट से विधायक बने। पहला लोकसभा चुनाव 1989 में बाढ़ सीट से जीता। तब नीतीश खुद को लालू का छोटा भाई बताते थे। जनता दल से नाता तोड़ समता पार्टी बनाई।
दूसरा दांव : भाजपा से दोस्ती
1998 में भाजपा से हाथ मिलाया। वाजपेयी सरकार में मंत्री बने। साल 2000 में कुछ दिनों के लिए बिहार के मुख्यमंत्री बने। केंद्र में रेल मंत्री बने। समता पार्टी का जदयू में विलय किया।
तीसरा दांव : राजग से तोड़ा नाता
लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रचार समिति अध्यक्ष बनाने के विरोध में 2013 में राजग से नाता तोड़ा।
चौथा दांव : राजद से गलबहियां
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद 2015 में अपने धुर विरोधी राजद से हाथ मिलाया। जबर्दस्त जीत हासिल की।
पांचवां दांव : भाजपा के साथ
2017 में राजग में शामिल हुए। राजद के भ्रष्टाचार के मामले को मुद्दा बनाया। भाजपा के सहयोग से फिर मुख्यमंत्री बने।
छठा दांव : फिर राजद के साथ
अब मंगलवार को नीतीश ने एक बार फिर से राजद से हाथ मिला कर अपने कॅरिअर का छठा सियासी दांव लगाया। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से सीएम बनेंगे।
बिना बहुमत के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड
जीतनराम मांझी के कार्यकाल को हटा दें तो नीतीश 2005 से अब तक लगातार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। मजे की बात यह है, इस दौरान हुए चार चुनावों में जदयू एक बार भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई। साल 2015 में जब उन्होंने राजद, कांग्रेस के साथ सरकार बनाई थी तब राजद के 80 सीटों के मुकाबले जदयू के पास 71 सीटें थी। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू को भाजपा के मुकाबले करीब आधी सीटें ही आईं।
बीते चुनाव में सिर्फ भाजपा का बढ़ा ग्राफ जदयू और राजद को उठाना पड़ा नुकसान
बीते दो विधानसभा चुनाव की तुलना करें तो बिहार में सिर्फ भाजपा ने ही अपने प्रदर्शन में सुधार किया है। इस दौरान जदयू, राजद और कांग्रेस जैसे दलों को पहले के मुकाबले कम सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। भाजपा ने इस दौरान अपनी सीटों में सौ फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी की है। जबकि जदयू और राजद के प्रदर्शन में गिरावट आई है।
मसलन 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने हिस्से की 157 सीटों में से 53 सीटें जीत पाई। इसके अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 110 सीटों में से 74 सीटों पर सफलता मिली। इसकी तुलना में जदयू का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। पार्टी 2015 में अपने हिस्से की 101 सीटों में से 71 तो बीते विधानसभा चुनाव में 115 सीटों में से महज 45 सीटें जीत पाई।
यूं उठाया खामियाजा
अब तक मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में रहे राजद के प्रदर्शन में भी गिरावट दर्ज की गई। पार्टी को 2015 में अपने हिस्से की 101 सीटों में से 80 सीटें मिलीं, जबकि इसके अगले चुनाव में पार्टी 144 सीटों में से महज 73 सीटें जीत पाई। कांग्रेस ने इसी दौरान 2015 में 41 में से 27 तो साल 2020 में 70 में से 20 सीटें ही जीत पाई।
लोजपा के दोनों ही गुट भाजपा के साथ
बिहार की राजनीति में भले ही विधानसभा में सारे दल भाजपा को छोड़ दूसरी तरफ जमा हो गए हों, लेकिन राज्य की दलित की दावेदार लोजपा के दोनों गुट उसके साथ हैं। लोजपा संसदीय दल के नेता और केंद्रीय मंत्री पशुपति पारस ने कहा कि वह भाजपा के साथ हैं क्योंकि देश को पीएम नरेंद्र मोदी जैसा दूसरा नेता मिलना असंभव है। वहीं, चिराग पासवान ने कहा, नीतीश अवसरवादी नेता हैं।