खास बात यह है कि सिंधिया ने अपना इस्तीफा नौ मार्च को लिख दिया था। कांग्रेस ने भी देर न करते हुए 20 मिनट में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। इसके बाद मध्यप्रदेश के 22 कांग्रेस विधायकों ने अपने इस्तीफे के साथ ग्रुप फोटो भेज दिया। जिसने कमलनाथ सरकार की मुश्किलें बढ़ाने का काम किया।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर कांग्रेस के अंदर जारी गुटबाजी और शीर्ष नेतृत्व की उदासीनता को दिखाने का काम किया। पिछले कई सालों से पार्टी के अंदर पीढ़ीगत टकराव चल रहा है। जिसकी गाहे-बगाहे झलक दिखती रहती है। वहीं जिस समय देश में सीएए-एनआरसी को लेकर बहस जारी है, उस समय एक अहम नेता के इस्तीफे से विपक्षी पार्टी को जोर का झटका लगना स्वाभाविक है।
सिंधिया बेशक धीरे-धीरे कांग्रेस से दूरी बना रहे थे लेकिन उन्हें पार्टी में राहुल गांधी का करीबी माना जाता था। वह 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल के बगल में बैठे हुए नजर आए थे। उनकी इच्छाओं के साथ सामंजस्य बैठाने और उन्हें मध्यप्रदेश की राजनीति से अलग करने का खामियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ेगा।