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Bihar Assembly Election 2020: पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कैसा रहा है पार्टियों का प्रदर्शन, एक नजर

Wed, 07 Oct 2020 11:41 AM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
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बिहार चुनाव - फोटो : सांकेतिक
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Bihar Election 2020: बिहार विधानसभा चुनाव की आखिरी गिनती शुरू हो चुकी है। तीन चरणों में होने वाले चुनाव में पहले चरण का मतदान 29 अक्तूबर को होना है। पिछली बार से अलग इस बार भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) एक बार फिर साथ आए हैं। हालांकि, लोक जनशक्ति पार्टी ने नीतीश से नाराजगी जाहिर करते हुए अकेले चुनाव लड़ने मगर भाजपा को समर्थन देने की बात कही है। 

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कोविड-19 महामारी के बीच होने जा रहे इस चुनाव को लेकर राजनीतिक दिग्गज माथापच्ची करने में जुटे हैं कि इस बार बिहार का ऊंट किस करवट बैठैगा। इससे पहले बिहार में साल 2005, 2010 और 2015 में विधानसभा चुनाव हुए थे। ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं बिहार में पिछले तीन विधानसभा चुनावों का हाल। जानिए पिछले तीन चुनावों में किस पार्टी ने कैसा प्रदर्शन किया था। किसका वोट शेयर और सीटों में बढ़त हुई थी तो किसे नुकसान हुआ था।

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2005: भाजपा-जदयू साथ मिलकर लड़े और जीते

2005 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो यह चुनाव भाजपा और जदयू ने मिलकर लड़ा था। वहीं, कांग्रेस, राजद, एनसीपी और माकपा दल साथ लड़े थे। लोजपा ने भाकपा और एआईएएफबी के साथ लोजपा लेफ्ट नामक मोर्चा बनाया था। इस चुनाव में जदयू ने सर्वाधिक सीटें जीतते हुए भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। 

जदयू ने 88 सीटों पर विजय पाई थी तो भाजपा ने 55 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं, कांग्रेस नौ सीटों पर ही सिमट गई थी। लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने 54 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन सहयोगियों का लचर प्रदर्शन उन्हें सत्ता नहीं दिलवा सका। इसके अलावा अन्य के खाते में 22 सीटें गई थीं। लोजपा ने 10, भाकपा ने तीन और एनसीपी और माकपा को एक-एक सीट पर जीत नसीब हुई थी।

इस चुनाव में सबसे ज्यादा वोट शेयर राजद का (23.4 फीसदी) रहा था। सबसे ज्यादा सीट जीतने वाली जदयू का वोट शेयर 20.4 फीसदी, भाजपा का 15.6 फीसदी, कांग्रेस का 6.1 फीसदी, लोजपा का 11 फीसदी रहा था। वहीं अन्य के खाते में 19.8 फीसदी वोट गए थे। इसके अलावा कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ने वाली एनसीपी का वोट शेयर 0.8 और माकपा का वोट शेयर 0.6 फीसदी रहा था। 

2010: भाजपा का वोट शेयर बढ़ा, कांग्रेस की स्थिति और खराब हुई

साल 2010 के चुनाव में भाजपा और जदयू फिर मिलकर चुनाव लड़े थे। इस बार राजद और लोजपा साथ आए थे वहीं, कांग्रेस ने अलग चुनाव लड़ा था। इस बार फिर जदयू की सीटों में भारी इजाफा हुआ और उसने 115 सीटों पर जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा की सीटें भी बढ़ीं और उसने 91 सीटों पर अपना झंडा लहराया। 

2005 के चुनाव में राजद ने जहां 54 सीटें जीती थीं वहीं इस बार उसे केवल 22 सीटें मिलीं। वहीं, कांग्रेस की स्थिति और खराब हुई। 2005 में नौ सीटों पर मिली जीत की तुलना में इस बार उसे केवल चार सीटों पर ही जीत हासिल हुई। लोजपा को भी केवल तीन सीटों पर जीत मिल पाई। अन्य के खाते में इस बार आठ सीटें गईं। 

इस बार वोट शेयर सबसे ज्यादा अन्य के खाते में (27 फीसदी) गया था। भाजपा का वोट शेयर पिछले चुनाव के मुकाबले कुछ बढ़ा और 16.5 फीसदी रहा। जदयू का वोट शेयर में भी इजाफा हुआ जो 22.6 फीसदी रहा। राजद के वोट शेयर में कमी आई (18.8 फीसदी) तो लोजपा का 6.7, कांग्रेस का 8.4 फीसदी रहा। 
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2015: अलग हुए भाजपा और जदयू, महागठबंधन जीता

साल 2015 की बात करें तो ये चुनाव काफी दिलचस्प थे। सालों से साथ रही भाजपा और जदयू अलग हो गए थे तो कट्टर विरोधी रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार साथ आ गए थे। इस गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल थी। वहीं, भाजपा ने लोजपा और रालोसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। 

इस चुनाव में महागठबंधन ने सरकार बनाई और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन दो साल में ही नीतीश ने महागठबंधन का साथ छोड़ भाजपा से हाथ मिला लिया। इस चुनाव में सबसे ज्यादा वोट शेयर भाजपा (25 फीसदी) का था। लेकिन जीत उसे महज 53 सीटों पर मिली थी। 

2015 के चुनाव में महागठबंधन के सामने भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। राजद ने सबसे ज्यादा 80, जदयू ने 71 और कांग्रेस ने 27 सीटों पर कब्जा किया था। भाजपा के खाते में 53 सीटें आई थीं। लोजपा और रालोसपा को दो-दो सीटें मिली थीं। जीतनराम मांझी की पार्टी हम को एक सीट मिली थी।

इस चुनाव में भाजपा भले ही जीत न सकी हो लेकिन वोट शेयर सबसे ज्यादा उसी का (25 फीसदी) था। राजद का वोट शेयर 18.8 फीसदी, जदयू का 17.3 फीसदी और कांग्रेस का वोट शेयर 6.8 फीसदी रहा था। लोजपा का वोय शेयर पांच फीसदी और रालोसपा का 2.6 फीसदी था। हम ने भी 2.4 फीसदी वोट शेयर पाया था। 

 
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