निजता को मौलिक अधिकार करार दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले केबाद आधार, ‘अधर’ में लटक सकता है। इस फैसले के बाद आधार की संवैधानिक वैधता का परीक्षण कर रही पांच सदस्यीय पीठ केसमक्ष केंद्र सरकार का पक्ष कमजोर पड़ सकता है।
चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि निजता का अधिकार ‘प्रबुद्ध मनोभाव’ है। आधार को लेकर सरकार की दलील रही है कि आधार केजरिए सरकार की लाभकारी योजनाओं को गरीब लोगों तक पहुंचाया जा रहा है और यह आम लोगों के लिए फायदेमंद है।
केंद्र सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि विकासशील देशों में लाखों लोगों को जीवन की मूलभूत जरूरत की चीजें उपलब्ध नहीं है।
लोगों केपास रहने की जगह नहीं है, खाने के लिए भोजन नहीं है, पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं, ऐसे में निजता को अधिकार को मौलिक अधिकार बताने का दावा बेमानी है। लेकिन न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन ने अपने लिखे फैसले में सरकार केइन तमाम दलीलों को दरकिनार कर दिया है। उन्होंने कहा कि प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में किसी तरह विरोधभास नहीं है।