25 जुलाई 1997 को बिहार में पहली बार कोई महिला राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं।
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जंगलराज, नरसंहार और परिवारवाद का उदय
लालू यादव ने खुद को गरीबों का मसीहा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने वेटरनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर में रहकर अफसरों को तलब किया, हेलिकॉप्टर को उड़नखटोला नाम दिया और चरवाहा स्कूल जैसे कॉन्सेप्ट लाए, जिससे पिछड़े वर्ग को आत्मसम्मान मिला। लेकिन, जिस जातीय प्रभुत्व (अगड़ों का) को उन्होंने समाप्त किया, धीरे-धीरे उन्होंने खुद ही परिवार और अपनी जाति का एक नया प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कर दिया। उनके शासनकाल में जातीय उन्माद और संघर्ष तेज हुआ, जिसने बड़े नरसंहारों का रूप लिया। 1992 में बारा नरसंहार (35 सवर्ण मारे गए), 1996 में बथानी टोला नरसंहार, और दिसंबर 1997 में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार जैसी घटनाओं के कारण विरोधियों ने लालू-राबड़ी शासन को जंगल राज कहा। इसके अलावा, 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाला ने उनकी छवि को दागदार बनाया। रेलवे घोटाला और शिल्पी जैन हत्याकांड, शहाबुद्दीन तेजाब कांड जैसी अनेक घटनाएं आज भी बिहार के लोगों के दिल-दिमाग से निकल नहीं सकी हैं।
- गरीब-गुरबा और मुस्लिम-यादव जैसे समीकरण लालू के परिवारवाद के आगे जमींदोज हो चुके हैं। लालू ने राजनीति की शुरुआत पुराने साथियों नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और शरद यादव के साथ की थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इन साथियों से अलग होकर 1997 में अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। यह परिवारवाद का वह सिलसिला था जो आज भी उनके पुत्रों और पुत्री के रूप में जारी है। तेजस्वी यादव को उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं। कांग्रेस से भी महागठबंधन का उम्मीदवार घोषित करा लिया है। दूसरे पुत्र तेज प्रताप बागी हैं। बहनें भी खुश नहीं हैं, तेजस्वी से लेकिन राजमहलों के अंदर जैसी उठा-पठक या जिसे पैलेस पॉलिटिक्स कहते हैं, वह लालू कुनबे के अंदर शुरू हो चुकी है। यही कारण है कि नीतीश के भाजपा के साथ आने के बाद से लालू या उनकी पार्टी राजद अपने बूते सत्ता में नहीं आ सकी। जिस राजनीति का प्रतिकार करके वह आगे बढ़े थे, वही काम जब उन्होंने किया तो नीतीश के चेहरे पर भरोसा कर बिहार की जनता ने लालू की सियासत का प्रतिकार कर दिया।