बिहार में ऐतिहासिक मतदान प्रतिशत अपने साथ राजनीतिक विरोधाभास भी सामने लाया है। एक तरफ, यह मुस्लिम मतदाताओं के साइलेंट कंसोलिडेशन का संकेत है। दशकों में पहली बार संगठित और रणनीतिक वोटिंग का पैटर्न दिखा, जो सीधे महागठबंधन के पक्ष में इतिहास रचने की क्षमता रखता है। दूसरी तरफ, यही एकजुटता उत्तरी बिहार और सीमांचल के रण में असदुद्दीन ओवैसी के दमदार फैक्टर से टकरा रही है।
सन्नाटे का शोर सबसे ज्यादा
मौन माई और महिला कवच, दो खामोश सेनाएं आमने-सामने
एनडीए : सुशासन का नारा और महिला कवच
पटना में दो हफ्तों से हेलिकॉप्टरों की आवाज लगातार गूंजती रही। पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक हर बड़े चेहरे ने बिहार की जमीन पर दस्तक दी। हर सभा, हर रोड शो में संदेश एक ही...नीतीश कुमार का नेतृत्व और सुशासन की वापसी। अशक्त कहे जा रहे नीतीश के 163 से अधिक रैलियां करने का आंकड़ा अपने आप में बताता है कि एनडीए ने चुनावी मोर्चा किसी एक दल पर छोड़ा ही नहीं। एनडीए के बूथ प्रमुख अगड़ी और ईबीसी बस्तियों में जंगलराज का डर दोहराते दिखे।
महिलाओं के बीच तस्वीर अलग है। दलित बस्तियों से गाव की चौपालों तक महिलाएं नीतीश के लिए सधी हुई वफादारी के साथ खड़ी दिखती हैं। शराबबंदी, पेंशन, साइकिल मनी, आंगनवाड़ी योजनाएं...सभी का असर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में सीधे-सीधे महसूस होता है। यही एनडीए का महिला कवच है। हालांकि जमीनी रिपोर्ट अलग कहानी कहती है। खासकर युवाओं की नजरों में एक सवाल सा दिखता रहा कि नौकरी कहां है।
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महागठबंधन: मौन व युवा बेचैनी
तेजस्वी की सभाओं का अलग रंग दिखा। कम शोर ज्यादा अनुशासन। मंच पर तेजस्वी बेरोजगारी महंगाई और सरकारी नौकरी की बात करते हैं। मंच के पीछे ब्लॉक स्तर के नेता मौन माई समीकरण मुस्लिम और यादव वोट को धीरे-धीरे एकजुट करने में लगे रहते हैं। मुस्लिम बहुल इलाकों में बड़ी रैलियां नहीं, छोटे-छोटे संपर्क अभियान हुए। लक्ष्य स्पष्ट था, ज्यादा शोर से ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, इसलिए साइलेंट गोलबंदी ही काम करेगी।
यादव बस्तियों में पुरानी पारिवारिक निष्ठा अभी भी कायम है, जबकि गैर यादव बेरोजगार युवाओं में तेजस्वी की नई छवि ने जगह बनाई है। यह बदलाव सीमांचल की गलियों में सर्वाधिक महसूस होता है, जहां महागठबंधन की कतारों में मुस्लिम महिलाओं की शांत उपस्थिति और युवाओं की उत्सुकता एकसाथ दिखी। महागठबंधन के स्थानीय नेता यादव और मुस्लिम समुदाय को एकजुट रहिये...की फुसफुसाहट सुनाते रहे।
तीसरी परत: पीके और ओवैसी की भूमिका
प्रशांत किशोर की जन सुराज राज्यव्यापी लहर तो नहीं बना पाई, पर कई सीटों पर अगड़ी जातियों और पढ़े-लिखे युवाओं में उनका प्रभाव दिखा। इससे मुकाबला त्रिकोणीय बन गया। सीमांचल में एआईएमआईएम की भूमिका भी इसी तरह है। बूथों पर उनका असर महागठबंधन के मुस्लिम वोटबैंक में हल्की सी दरार डाल सकता है।