उनकी व्यक्तिगत सलाह मेरे भरोसे का प्रतिफल थी। लेकिन मैं तो उस दिन कंबल बेचने निकला ही नहीं था! मैंने उन अधिकारियों से कहा कि मैं ये कंबल दान करने के लिए लाया हूं। चूंकि हर जरूरतमंद तक पहुंच पाना मेरे लिए मुश्किल है, इसलिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके कंबलों को उचित व्यक्तियों को बांटा जा सकता है। मैंने अपनी बात कही, मगर अधिकारियों को लगा कि मैं मजाक कर रहा हूं। उन्होंने मुझसे पूछा कि यदि मैं ये सारे कंबल दान कर दूंगा, तो फिर घर कैसे चलाऊंगा।
मगर मेरी प्रतिबद्धता देखते हुए अधिकारी मुझे एक राहत शिविर में ले गए। संयोग ही था कि शिविर में जिलाधिकारी भी पहुंचे हुए थे। मैंने सारे कंबल उन्हीं को सुपुर्द कर दिए। मेरे लिए यह एक ऐसा मौका था, जब मैं उस भूमि को कुछ वापस कर रहा था, जिसने मुझे जीवन दिया है। हालांकि यह भी सच है कि किसी उत्तर भारतीय श्रमिक का दक्षिणी राज्यों में काम कर पाना इतना आसान भी नहीं है, जिसमें भाषा एक बड़ी भूमिका निभाती है। लेकिन यदि स्थानीय भाषा सीख ली जाए, तो मूल निवासियों और उत्तर भारत के 'भैया' के बीच की दूरी बहुत तेजी से घटती है। मैं साल में दो-तीन दफे हरियाणा से माल मंगाता हूं।
कमाई का बड़ा हिस्सा नीमच में रह रहे अपने परिवार के लिए भेज देता हूं। काम की वजह से मेरी पढ़ाई छूट गई थी, जिसे मैं दोबारा पूरी करने की कोशिश कर रहा हूं। दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के तहत मैंने स्नातक में प्रवेश लिया है। मैं अब केरल में ही रहना चाहता हूं। यहीं के सुख-दुख का हिस्सा बनना चाहता हूं और यह भी ख्वाहिश है कि इसी धरती की संस्कृति में घुल-मिल जाऊं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।