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मध्य प्रदेश के विष्णु केरल बाढ़ पीड़ितों के लिए बने 'भगवान', दान देकर लौटाया आजीविका का कर्ज

Mon, 20 Aug 2018 02:51 PM IST
विष्णु कछावा
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विष्णु कछावा
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मैं मूलतः मध्य प्रदेश के नीमच जिले से हूं, लेकिन केरल का कन्नूर मेरा दूसरा घर है। मेरे एक बड़े भाई अध्यापक हैं और बाकी के हम सभी भाई कंबल का व्यापार करते हैं। केरल ने मुझे रहने के लिए घर दिया है, परिवार को चलाने के लिए आजीविका दी है और सबसे बड़ी बात कि मुझे इस राज्य में एक बेहतरीन जलवायु मिली है। किसी जगह ने आपको इतनी चीजें दी हों और जब वह संकट में हो, तो आपका फर्ज बनता है कि आप भी उसे कुछ लौटाएं।

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मेरी उम्र सोलह साल थी, जब मैं केरल आ गया था। फिलहाल मैं यहां अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता हूं। पिछले बारह वर्षों से मैं कन्नूर जिले के इरिटी इलाके में काम कर रहा हूं। मैं यहां घूम-घूमकर कंबल, पायदान और दूसरी तरह के कपड़े बेचता हूं। मैं साझेदारों के साथ मिलकर उत्तर भारत से कंबल मंगाकर यहां व्यवसाय करता हूं। यहां बिताए लंबे वक्त के दौरान मैंने कभी यहां के लोगों को उतना बेबस नहीं पाया, जितना कि इन दिनों आई भीषण बाढ़ के दौरान देखा है।

मैं जिन जगहों में जाकर कंबल बेचता हूं, उनमें इरिटी तालुक का दफ्तर भी शामिल है। दस दिन पहले की बात है। दर्जनों कंबलों के ढेर के साथ मैं इरिटी तालुक दफ्तर पहुंचा, तो वहां के अधिकारियों ने खराब मौसम और भूस्खलन की आशंकाओं को लेकर मुझे चेताया। एक अधिकारी ने मुझे भारी बारिश की वजह से दूर-दराज के गांवों में न जाने की हिदायत दी। दरअसल सही कीमत और साफ व्यापार के चलते अधिकारी लोग मुझे अच्छी तरह से जानते हैं। लोगों को मेरे सामान पर भरोसा होता है।

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उनकी व्यक्तिगत सलाह मेरे भरोसे का प्रतिफल थी। लेकिन मैं तो उस दिन कंबल बेचने निकला ही नहीं था! मैंने उन अधिकारियों से कहा कि मैं ये कंबल दान करने के लिए लाया हूं। चूंकि हर जरूरतमंद तक पहुंच पाना मेरे लिए मुश्किल है, इसलिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके कंबलों को उचित व्यक्तियों को बांटा जा सकता है। मैंने अपनी बात कही, मगर अधिकारियों को लगा कि मैं मजाक कर रहा हूं। उन्होंने मुझसे पूछा कि यदि मैं ये सारे कंबल दान कर दूंगा, तो फिर घर कैसे चलाऊंगा।

मगर मेरी प्रतिबद्धता देखते हुए अधिकारी मुझे एक राहत शिविर में ले गए। संयोग ही था कि शिविर में जिलाधिकारी भी पहुंचे हुए थे। मैंने सारे कंबल उन्हीं को सुपुर्द कर दिए। मेरे लिए यह एक ऐसा मौका था, जब मैं उस भूमि को कुछ वापस कर रहा था, जिसने मुझे जीवन दिया है। हालांकि यह भी सच है कि किसी उत्तर भारतीय श्रमिक का दक्षिणी राज्यों में काम कर पाना इतना आसान भी नहीं है, जिसमें भाषा एक बड़ी भूमिका निभाती है। लेकिन यदि स्थानीय भाषा सीख ली जाए, तो मूल निवासियों और उत्तर भारत के 'भैया' के बीच की दूरी बहुत तेजी से घटती है। मैं साल में दो-तीन दफे हरियाणा से माल मंगाता हूं।

कमाई का बड़ा हिस्सा नीमच में रह रहे अपने परिवार के लिए भेज देता हूं। काम की वजह से मेरी पढ़ाई छूट गई थी, जिसे मैं दोबारा पूरी करने की कोशिश कर रहा हूं। दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम के तहत मैंने स्नातक में प्रवेश लिया है। मैं अब केरल में ही रहना चाहता हूं। यहीं के सुख-दुख का हिस्सा बनना चाहता हूं और यह भी ख्वाहिश है कि इसी धरती की संस्कृति में घुल-मिल जाऊं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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