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बोम्मई एन वास्तु: मां की पीड़ा देख बना डाली मशीन

Tue, 09 Jan 2018 05:57 PM IST
बोम्मई एन वास्तु
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bommai
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मैं कर्नाटक के चित्रदुर्ग स्थित बुकासागरा गांव में रहता हूं। मुझे रोटी बहुत पसंद है और मेरी पसंद का खाना बनाने के लिए मेरी मां हर रोज रसोई में मेहनत करती है। वाकया तब का है, जब मैं हर रोज अपनी बूढ़ी मां को रसोई में पसीना बहाते देखता। चपाती बेलना उनके लिए सबसे मुश्किल काम होता था। आटा फैलने से बचने के लिए वह चकले के इर्द-गिर्द कई अखबार बिछाती थीं।
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पेशे से वेल्डर होने के नाते मेरे दिमाग में एक दिन ख्याल आया कि क्यों न मैं एक ऐसी मशीन ईजाद करूं, जिससे मेरी मां की मुश्किलें कम हो सकें। मैंने सोचा कि मां ही क्यों, अगर मैं अपने प्रयास में सफल हो गया, तो पूरे राज्य में रोटियों के शौकीनों के लिए भी मेरी मशीन उपयोगी हो सकती है!

यही सब सोचकर मैं मशीन बनाने के काम में जुट गया। अपने प्रारंभिक शोध में मैंने पाया कि चेन्नई में रोटी बनाने के इसी सिद्धांत पर आधारित कई मशीनें पहले से अस्तित्व में हैं। लेकिन वे सारी मशीनें भारी-भरकम मोटर से लैस हैं, जिन्हें विभिन्न प्रतिष्ठान अधिकांशतः थोक में रोटियां बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। मगर मेरे दिमाग में मशीन का जो मॉडल घूम रहा था, वह छोटा और सुविधाजनक था।
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मेरा यह कोई पहला ऐसा ख्याल नहीं था, जो एक नए अविष्कार का आधार बनने वाला था, बल्कि अतीत में भी मैं अक्सर यही सोचता था कि कुछ ऐसा किया जाए, जिससे गरीबों की जिंदगी आसान हो सके। लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी रहीं कि मेरी पढ़ाई नहीं हो सकी। मैंने शुरू में साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोली थी, जो आगे चलकर लाइसेंसी मैकेनिकल वर्कशॉप में तब्दील हो गई।

मशीनों के बीच गुजर रही मेरी जिंदगी में रोटी बनाने की मशीन बनाने के लिए जरूरी सामान इकट्ठा करने में मुझे परेशानी नहीं हुई। लेकिन तकनीक और मशीन की साइज को लेकर मुझे कई प्रयोग करने पड़े। अंततः एक दिन ऐसा आया, जब मैंने किसी इंडक्शन कुकर के क्षेत्रफल के बराबर रोटी बनाने की सुविधाजनक मशीन बना डाली।

इस मशीन में सिर्फ गुंधे हुए आंटे को दो पतली प्लेटों के बीच रखकर ऊपर लगी एक पिन को घुमाना होता है। अगले बीस सेकंड में रोटी बनकर तैयार हो जाती है। मैंने मशीन के लिए इतने हल्के मोटर का प्रयोग किया, जो दस घंटे के इस्तेमाल में मात्र एक यूनिट बिजली की खपत करती है। अच्छी बात यह है कि इसे सौर ऊर्जा से भी संचालित किया जा सकता है। मात्र एक मशीन बनाने के कारण इस मशीन की लागत थोड़ी ज्यादा है, पर यदि इसे ज्यादा मात्रा में बनाया जाएगा, तो निश्चय ही यह किफायती मूल्य पर बन सकती है।

लगातार एक घंटे चलाने पर 180 से ज्यादा रोटियां बना सकने वाली इस मशीन के प्रयोग से मेरी मां काफी खुश हैं। मना तो वह पहले भी नहीं करती थीं, पर मैं देखता हूं कि अब उन्हें रोटी बनाने का काम बोझ नहीं लगता। इससे उनका पर्याप्त समय भी बच जाता है। मैं चाहता हूं कि मेरे प्रयोग को बड़े स्तर पर विकसित किया जाए, पर मेरी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि बिना किसी बाहरी मदद के मैं ऐसा कर पाऊं।

मैं मानता हूं कि ऐसे छोटे-छोटे यंत्र आम भारतीयों की जिंदगी काफी हद तक आसान बना सकते हैं, जरूरत बस है इनके निर्माताओं को प्रोत्साहन की।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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