दस साल के एक बच्चे को डेंगू था। उसे खून की सख्त जरूरत थी। मैंने उसके लिए खून का इंतजाम किया। बच्चे को मेरे बारे में पता चला, तो आश्चर्यजनक तरीके से उसने मुझे 'परी आंटी' कहकर पुकारा। वह आईसीयू में भर्ती था। उसने मेरे सामने एक इच्छा रखी कि कुछ ही दिनों में आने वाले अपने जन्मदिन पर वह मेरे हाथों से बेक किया गया केक खाना चाहता है। मैंने उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए डॉक्टर से अस्पताल में उसका जन्मदिन मनाने की अनुमति मांगी। डॉक्टर ने दूसरे मरीजों का हवाला देते हुए पहले तो मना कर दिया, लेकिन बाद में कुछ शर्तों के आधार पर मान गए। मैंने दस मिनट के भीतर जन्मदिन समारोह निपटाकर उस बच्चे की ख्वाहिश पूरी की। अगली ही सुबह मुझे पता चला कि वह बच्चा इस दुनिया में नहीं रहा। उसकी मां ने मुझे उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह किया कि खून देने के नाते मैं उस बच्चे के परिवार का हिस्सा हूं।
ऐसी कई मार्मिक घटनाएं हैं, जिन्हें मैंने अपनी जिंदगी में अनुभव किया है। मैं बंगलूरू में रहती हूं और मेरे माता-पिता कर्नाटक से ही हैं, मगर मेरी परवरिश दिल्ली में हुई है। मेरे पिता संयुक्त राष्ट्र में एक वरिष्ठ अधिकारी थे। समाज सेवा की असली प्रेरणा मुझे अपने मां-बाप से ही मिली है। स्नातक करने के बाद मैंने सिंडिकेट बैंक की नौकरी से अपना करियर शुरू किया। वहां काम करते हुए मैं अक्सर वरिष्ठ मैनेजर के साथ स्थानीय बाजारों में जाया करती थी, जहां अनेक रेहड़ी वालों की आर्थिक समस्या से रू-ब-रू होती थी। मैं अपनी बचत उनके बच्चों की स्कूल फीस भरने में खर्च करती थी।