उस घटना को बीते सोलह साल से भी ज्यादा का वक्त हो गया है, पर जब भी मैं उस दृश्य को याद करता हूं, देश के करोड़ों बच्चों का बेबस बचपन आंखों के सामने जीवंत हो उठता है। मैं अमृतसर में था। स्वर्ण मंदिर से बाहर निकलने के बाद मैंने देखा कि कुछ बच्चे कचरे के ढेर में प्लास्टिक ढूंढ रहे थे। कचरे के ढेर में यह प्लास्टिक बाकी लोगों के लिए बेकार की वस्तु होती है, पर इसे ढूंढने वाले गरीब बच्चों के लिए उनके अस्तित्व की उम्मीद होती है। ऐसा नहीं है कि मीडिया का ध्यान इन बच्चों के नरकीय जीवन पर नहीं जाता, लेकिन यह ध्यान किसी औपचारिक हरकत से बढ़कर नहीं दिखता।
मैं अपनी सैन्य छावनी में लौट आया, मगर मैं कूड़ा बीनने वाले उन बच्चों को भूल नहीं पा रहा था। मेरे वरिष्ठ अधिकारी बेहद सख्त स्वभाव के थे, फिर भी वह अपने जूनियरों का हालचाल लेने अक्सर आते रहते थे। मैंने उन्हें पूरी घटना सुनाई और उनके सामने गरीब बच्चों के लिए कुछ करने की अपनी इच्छा व्यक्त की। मैंने अपने अधिकारी से ड्यूटी के बाद बच्चों को पढ़ाने की मोहलत देने की अनुमति मांगी, जिसके लिए अधिकारी ने तुरंत हां कर दी। 26 जनवरी, 2001 को मैंने अमृतसर में पांच बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और तब से आज तक निरंतर इसी प्रयास में रहता हूं कि किस तरह किस्मत के मारे इन बच्चों को किताबों के करीब ला सकूं।
दो साल बाद मेरा ट्रांसफर जम्मू हो गया। मुझे अपने तबादले के बारे में पहले ही पता चल चुका था, सो मैं इस तैयारी में जुट गया था कि उन बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। मैंने ऐसे नेक लोगों की तलाश कर ली थी, जिन्होंने मेरे जाने के बाद मेरा काम जारी रखा। जम्मू जाकर भी मैंने अपना पुराना काम जारी रखा। पंद्रह साल तक देश की सेवा करने के बाद करीब दस साल पहले मैं गढ़वाल राइफल से रिटायर हो गया।
हालांकि मैं बच्चों को पढ़ाता था, पर देहरादून में रह रहे अपने परिवार के साथ घर पर खाली बैठ पाना मेरी फितरत के खिलाफ था। मेरे परिवार को लगता था कि सिर्फ बच्चों को पढ़ाने का मतलब है कि मैं घर का पैसा बर्बाद कर रहा हूं। मैं बच्चों को पढ़ाता रहूं, परिवार की नाराजगी और न बढ़े, इसलिए मैंने एक बैंक में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने का फैसला लिया। यही ऐसा काम था, जो हम रिटायर्ड सैनिक आसानी से कर सकते हैं।
मैंने एक राष्ट्रीय बैंक के एटीम के प्रहरी की नौकरी शुरू कर दी। मेरी ड्यूटी शिफ्ट शाम से देर रात तक की थी। छह हजार रुपये प्रति महीने मिलने वाली पगार को मैं अपने लिए नहीं, बल्कि गरीब बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी जरूरतों पर खर्च करता हूं। इन बच्चों के जन्मदिन पर केक काटने के साथ इनके लिए पार्टी भी आयोजित की जाती है। घर-परिवार वाले काफी समय तक इस बात को लेकर भी मुझसे नाराज रहे, लेकिन धीरे-धीरे मेरे काम की सकारात्मकता ने उनका नजरिया बदल दिया और आज उन्हें मुझ पर गर्व है।
मैं मानता हूं कि एक सैनिक का काम लड़ना है, लेकिन सभी लड़ाइयां बाहरी दुश्मनों के खिलाफ सीमाओं पर ही नहीं लड़ी जातीं। मेरी लड़ाई निरक्षरता और गरीबी के खिलाफ है। बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए एक संघर्ष है। मैंने यह लड़ाई किसी जीत के लिए नहीं, बल्कि खुद की खुशी के लिए छेड़ी है और मैं अंतिम सांस तक इसे जारी रखना चाहता हूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।