प्लास्टिक और कचरे के बाद मेरे गांव में सबसे बड़ी समस्या खुले में शौच की थी। यहां तक कि जिन घरों में शौचालय बने हुए थे, उन घरों के लोग भी शौच के लिए खेतों में ही जाते थे। यह स्थिति दो साल पहले की थी, लेकिन आज चीजें बदल गई हैं। इस सुखद बदलाव के लिए मैंने खूब मेहनत की है। हालांकि मेरे दो पड़ोसियों समेत गांव में अब भी पंद्रह घर ऐसे बचे हैं, जहां शौचालय नहीं बना है। पर मैं कोशिश में हूं कि उन्हें भी समझाकर शीघ्र ही अपने गांव को खुले में शौच की शर्म से मुक्त करा दूं।
अपने काम के बारे में खुद जिक्र करने से कई लोग मुझे घमंडी समझते हैं, मगर उन्हें अंदाजा नहीं कि जिस बदलाव को होते हुए मैंने महसूस किया है, उससे मुझे किस स्तर की खुशी मिली है। सबसे बड़ी बात यह कि मैं कोई सरकारी कर्मी नहीं, बल्कि मात्र एक स्वयंसेवक हूं, इसलिए मेरे लिए कुछ खोने या पाने जैसी कोई स्थिति नहीं है। मेरा काम तो बस मेरी उस कल्पना का परिणाम है, जिसको जिद बनाकर मैंने किया है।
मुझे वह दिन भी याद है, जब मैं किसी के पास जाकर अपनी बात कहती थी, तो लोग दूर से ही हाथ जोड़कर मुझे भगा देते थे। इन बातों से विचलित न होने का परिणाम है कि आज जब मैं कुछ कहती हूं, तो लोग ध्यान से सुनते हैं। मैंने अपने कुछ दूसरे साथियों की मदद से लोगों को स्वच्छता के महत्व से परिचित कराया है।
अमर उजाला के मंजिलें और भी है से साभार