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'मेरे प्रयासों से अब तक 10 हजार से अधिक गरीब बच्चों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया है'

Mon, 21 May 2018 07:03 PM IST
निशिता राजपूत
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मां-बाप की अच्छी आदतें बच्चों की जिंदगी पर बहुत सकारात्मक असर करती हैं। मेरे साथ भी ऐसा हुआ। हमारे घर की परंपरा रही है कि हम कोई भी त्योहार घर के बजाय वृद्धाश्रम, अनाथालय या ऐसी जगहों पर जाकर मनाते हैं, जहां के लोगों के लिए त्योहार खुशी नहीं, बल्कि आंसू लेकर आते हैं।

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ऐसे मौकों पर हम सपरिवार उनके आंसू कम करने की कोशिश करते हैं। उनकी जरूरतों को समझते हैं और उनके साथ वक्त बिताते हैं। वड़ोदरा में हस्तशिल्प से जुड़ा कारोबार करने वाले पिता की सेवा भावना के कारण मैं बचपन से ही समाज के ऐसे वंचितों के प्रति बहुत संवेदनशील रही हूं।

सात साल पहले की बात है। उस वक्त मेरी उम्र मुश्किल से उन्नीस साल रही होगी। मैं बारहवीं की परीक्षा दे चुकी थी और आगे कॉमर्स की पढ़ाई के लिए तैयारी कर रही थी। गर्मियों की छुट्टियों में हम कई अनाथालयों में बेसहारा बच्चों से मिलने जाते थे। हमें अनुमति थी कि हम बच्चों को अपने घर लाकर उन्हें उस माहौल से परिचित कराएं, जो उन्हें किसी गोद लेने वाले परिवार के घर में देखने को मिलेगा।
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मसलन, परिवार के लोगों से कैसे पेश आना है आदि। मैंने घरों में काम करने वाली महिलाओं के साथ उनके कुछ ऐसे बच्चों को देखा, जो स्कूल नहीं जाते थे। शायद वे स्कूल जा भी नहीं सकते थे, क्योंकि उनकी गरीबी उन्हें इसकी इजाजत नहीं देती थी।

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Nishita Rajput
समाज के प्रति संवेदनशील तो मैं थी ही, मेरे दिमाग में ऐसे बच्चों को स्कूल पहुंचाने का ख्याल आया। दरअसल मैं एक ऐसी योजना के बारे में सोच रही थी, जिससे आगे चलकर हजारों गरीब बच्चों की जिंदगी बदल सकती थी!

अपने पहले प्रयास में ही मैंने पिता की मदद से अपने इलाके के कुल 351 बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित की, जिसके लिए मैंने उन सभी बच्चों की सालाना फीस जमा कर दी। यह इंतजाम मैंने शहर के तमाम दानदाताओं के माध्यम से किया था। दरअसल ऐसे कामों के लिए पैसे देने वालों की कमी नहीं है, लेकिन पारदर्शिता न होने के कारण लोग दान करने से हिचकते हैं। मैंने इसी मोर्चे पर काम किया। मैं खुद पैसे न लेकर बच्चों के फीस के नाम पर सीधे स्कूल या बच्चों के परिवार वालों के बैंक खातों में भुगतान होने वाले चेक स्वीकार करती हूं। उसके बाद जिस बच्चे को सहायता मिली है, उसकी पूरी जानकारी दानादाता से साझा करती हूं।

इससे लोगों का मुझ पर भरोसा बढ़ता गया और देखते ही देखते देश-विदेश से मदद मिलने लगी। नतीजतन मैंने अब तक दस हजार से अधिक संख्या में उन गरीब बच्चों को स्कूल पहुंचा दिया है, जो सिर्फ पैसों की वजह से नहीं पढ़ पाते। समाज में मेरी भूमिका यहीं तक सीमित नहीं है। मैं रोजाना शहर के उन अकेले 155 बुजुर्गों तक खाना पहुंचाती हूं, जिनका ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। मुझे यह ख्याल एक बा (दादी सरीखी महिला) को सूखा भात खाते देख आया था।

मैं ऐसे बुजुर्गों के आसपास लोग ढूंढती हूं, जो पैसे लेकर समय पर उनके घरों तक खाना पहुंचा दें। इसके अलावा मैं ऐसे लोगों के संपर्क में रहती हूं, जो अपने जन्मदिन पर केक दान करते हैं। मैं अपने दस्तावेज से उन बच्चों का नाम निकालती हूं, जिनका उसी दिन जन्मदिन होता है। चंदा लेने का मेरा पारदर्शी मॉडल यहां भी लागू रहता है। मैंने पीजी की पढ़ाई कुछ ही वक्त पहले पूरी की है, पर समाज सेवा का मेरा करियर तो कब का तय हो चुका है।
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