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'गरीब बच्चों की मदद करके चुका रहा हूं लोगों का एहसान'

Thu, 28 Jun 2018 03:44 PM IST
सुवस दार्वेकर
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सुवस दार्वेकर - फोटो : अमर उजाला
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स्कूल में नियम था कि सभी बच्चे चमकते हुए काले जूते पहनकर ही पढ़ने आएंगे। लेकिन हेडमास्टर ने मुझे टूटी-फूटी चप्पल पहनकर स्कूल आने से कभी नहीं रोका। मैं बचपन में एक पढ़ाकू बच्चा था। तेज होने के कारण मुझे शिक्षकों का विशेष स्नेह मिलता था। मुझपर हेडमास्टर साहब तो कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहे। दरअसल उन्हें मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति का बखूबी अंदाजा था। मैं बहुत छोटा था, जब एक दुर्घटना में मेरे पिता की आंखों की रोशनी चली गई।

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गरीब तो हम पहले से ही थे। लेकिन परिवार के एक मात्र कमाऊ इंसान के इस तरह बेकार हो जाने से हमारा परिवार एक-एक दाने का मोहताज हो गया। अनगिनत मौके आए, जब मेरे परिवार को भूखे पेट सोना पड़ा। मेरा बचपन समझने के लिए आप वे सारे दृश्य सोच सकते हैं, जो अभावों में रहने वाले किसी भी परिवार के साथ चलते हैं। मैं मुंबई की झुग्गियों में पला-बढ़ा एक दंत चिकित्सक हूं। बचपन में मैं पेट्रोल पंप और फैक्टरियों में काम करता था, ताकि घर वालों की मदद कर सकूं। मुझे याद है मैं आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, एक सीनियर ने मुझसे मेरी यूनिफॉर्म के बारे में पूछा था।

असमर्थता जताने के अगले ही दिन मुझे उन्होंने नई यूनिफॉर्म खरीद कर दी थी। अब तक की जीवन यात्रा में कई लोगों ने मेरी विभिन्न तरीके से मदद की है। शिक्षकों ने भावनात्मक सहारा दिया, तो कई दूसरे लोगों ने मेरी फीस का इंतजाम किया। लेकिन जब मैं बारहवीं कक्षा में था, तब फीस के लिए मात्र पचास रुपये कम पड़ जाने की वजह से मेरा पूरा साल बर्बाद गया था। अगले साल पढ़ाई पूरी करके मैंने चिकित्सक बनने का सपना देखा।

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गरीबों की बस्ती से स्कूल दूर होना भी एक बड़ी समस्या है...

प्रवेश परीक्षा और साक्षात्कार की बाधा पार करने के बाद मेरी पृष्ठभूमि देखते हुए इलाके के विधायक ने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए लगने वाली फीस जमा कर दी। मेरे लिए यह बड़ी राहत की बात थी। इस बीच मैं एक एनजीओ के संपर्क में आया, जिसने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए मुझे जरूरी उपकरण मुहैया कराए। डॉक्टर बनने के बाद मैंने खूब मेहनत की और बहुत जल्द अपना खुद का क्लीनिक शुरू कर दिया। लेकिन मेरा मकसद क्लीनिक खोलना नहीं, बल्कि दुनिया का वह कर्ज उतारना था, जिसकी बदौलत मैं कुछ हासिल कर सका। इसी उद्देश्य के साथ मैंने एक चैरिटेबल डेंटिस्ट ऑरगेनाइजेशन की शुरुआत की। यह संस्था आदिवासियों और वंचितों को मुफ्त चिकित्सीय सुविधाएं प्रदान करती है। धीरे-धीरे इस संस्था से सभी प्रकार के डॉक्टर जुड़ते गए।

मसलन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, हृदय विशेषज्ञ जैसे डॉक्टर मिलकर लोगों की सेवा कर रहे हैं। इसके अलावा मैंने हमेशा गरीब बच्चों की शिक्षा पर जोर दिया है, ताकि वे आगे चलकर अपनी और अपने परिवार की दरिद्रता दूर कर सकें। इसी कड़ी में मैंने अब तक हजारों जरूरतमंद बच्चों को जूते व अन्य जरूरी चीजें मुहैया कराई हैं। मैंने यह भी महसूस किया है कि गरीबों की बस्ती से स्कूल दूर होना भी एक बड़ी समस्या है।

स्कूल जाने के लिए बचपन में मैं भी दूसरों के रहमो-करम से बस के किराये का इंतजाम कर पाता था। चूंकि इन सारी बातों को मैं बहुत अच्छे से समझता हूं, इसलिए इस समस्या के
समाधान के लिए मैंने उन तमाम छात्र-छात्राओं को साइकिल खरीदकर दी है, जो सिर्फ स्कूल दूर होने की वजह से किताबों से दूर थे।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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